आचार्य श्री ज्ञानसागर महाराज साधक जन से जनसम्पर्क से बचने की बात कहते थे 

धर्म

आचार्य श्री ज्ञानसागर महाराज साधक जन से जनसम्पर्क से बचने की बात कहते थे 

आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज और आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज की छवि एवं नामार्थ में अंश भी भेद परिलक्षित नहीं होता। इस पाठ में इससे सम्बन्धित कुछ प्रतिनिधि रूप में प्रतीकात्मक प्रसंग प्रस्तुत हैं।

 

 

 

 

 

साधक जन सम्पर्क से बचें बिम्ब : आचार्य श्री ज्ञानसागरजी

 आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज साधु के लिये अधिक जन सम्पर्क से बचने की बातअक्सर कहा करते थे। वे कहते थे कि साधक को अपने में रहना चाहिए। प्रचार-प्रसार में ज्यादा नहीं पड़ना चाहिए। यही कारण रहा कि आचार्य श्री ज्ञानसागरजी का अधिकांश साहित्य उनके समाधिमरण के बाद ही प्रकाशित हुआ। 

 

 

 

 

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दर्पण : आचार्य श्री विद्यासागरजी – 

आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज भी अपने शिष्यों से जन सम्पर्क से दूर रहने की बात प्रायः कर कहते हैं। वे कहते हैं- श्रावकों से ज्यादा सम्पर्क रखोगे तो लुट जाओगे, इस लूट से आपको कोई भी नहीं बचा पायेगा।’* एक बार आचार्यश्री ने कक्षा में अपने शिष्यों से कहा- “जन सम्पर्क से दूर रहा करो। किसी के आने पर सब लोग ‘well come’, आइए-आइए करते हैं, लेकिन तुम लोग ‘well go’ किया करो।” उनसे कहा करो- ‘अच्छा आप जा रहे हैं। बहुत अच्छा, बहुत अच्छा जो आपने हमें अकेले रहने का अवसर दिया।* ’ धीरे से किन्हीं शिष्य मुनिराज ने प्रसन्न होते हुए गुरुजी से जिज्ञासा की कि यदि ऐसा कहेंगे तो उन्हें बुरा नहीं लगेगा? 

 

 

 

आचार्यश्रीजी बोले – “अगर बुरा लगे तो उन्हें कह देना कि मैं साधु हूँ, गृहस्थ नहीं।’

तू छोड़ के विषमयी स वासना को,

निश्चिन्त हो, कर निजीय उपासना को।

निर्धान्त शिवरमा तुझको वरेगी,

योगी कहे परम प्रेम सदा करेगी  

 

श्रमण शतक

आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज 

साभार: विद्या,गुरु

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