आप अयोग्य व्यक्ति के लिए कुछ नही कर सकते जिसे अनिष्ट की पहचान ही नहीं हो- सुधासागर महाराज
अशोकनगर –
आप अयोग्य व्यक्ति के लिए कुछ नही कर सकते है जिसे अनिष्ट की पहचान ही नहीं हो पूरी दुनिया में योग्य व्यक्ति को ही पूछा जाता है ये बात अलग है कि पुण्य की हीनता में योग्य होते हुए व्यक्ति पीछे रह जाता है योग्य होने के साथ पुण्य और यशकीर्ती कर्म का उदय भी होना चाहिए तब कहीं जाकर आपको उचित स्थान मिलेगा इष्ट अनिष्ट दोनों में किसी ना किसी का उदय चलता रहता है अनिष्ट को हटा सकते इष्ट अपने आप आपके पास आ जायेगा दो चीजों को जानना जरूरी है एक चीज जो हमारे लिए हानिकारक है हमे पता है लेकिन हम से छूटती नहीं हैं।स्थावर में वो क्षमता नहीं कि वो अनिष्ट को हटा सके वह तो प्रतिकार भी नहीं कर सकता है आप अयोग्य व्यक्ति के लिए कुछ नही कर सकते क्योंकि उसे अनिष्ट की पहचान ही नहीं हो सकती उक्त आश्य केउद्गार सुभाषगंज मैदान में विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि पुगंव श्री सुधासागरजी महाराज ने व्यक्त किए।
दया धर्म में सामने वाले को लाभ हो और उसेसुख की अनुभूति होना चाहिए महाराज श्री ने कहा कि दया उसको कहते है जिससे सामने वाले को लाभ हो उसको सुख की अनुभूति हो हम चींटी को बचाते है वह दया नहीं है चींटी को बचाकर हम अपने महाव्रतो को बचा रहे हैं हमने चींटी की चिंता नहीं की अपने धर्म की चिंता की है उसे बचाना उपचार से दया कहा गया है उसे हम लाभ नही दे पाये हमारी दया से उसे जाग्रती लाभ अनुग्रह होना चाहिये। त्रस जीवों को करुणा से सामान्य से पुण्य बंध होता है तीर्थकर प्रकृति का बंध सामने वाले को आपके भावों से क्या लाभ हुआ उससे आपके धर्म की शुरुआत हुई।
निजी स्वार्थ रखना नहीं व अहित करना नहीं
उन्होंने कहा कि लक्ष्य की प्राप्ति के लिए काम करते रहना चाहिए आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने जब हमें बाहर भेजा जब ही सीख दी थी जो आज सिद्धांत बनकर हमारे जेहन में रहतीं हैं कभी निजी स्वार्थ रखना नहीं अहित किसी का करना नहीं सब कार्य अपने आप होते चले जायेंगे दान का स्वरुप बनाना चाहिये दान की प्रेरणा नहीं देना, हमें तो दान की महिमा बताना है सही दान के लक्षण क्या हैं दान का स्वरूप बताना,दान का आदेश नहीं देना चाहिये इससे जो हम कहते है वह होने लगता है इसलिए आप लोगों को भी इस नियम का पालन करना चाहिए निजी स्वार्थ रखना नहीं अहित किसी का करना नहीं फिर देखना चमत्कार कैसे होते हैं 



दुकान ग्राहक के हिसाब से होना चाहिए तब खूब चलेगी
उन्होंने कहा कि दुकान ग्राहक के हिसाब से होना चाहिए तब खूब चलेगी यदि दुकान को आप अपने हिसाब से चलायें तो जरूरी नहीं कि वो चले आचार्य श्री समंतभद्र स्वामी वो आचार्य थे जिन्होने ग्राहक के हिसाब से अपनी दुकान में माल रखा वे बहुत बडे दार्शनिक थें उन्होंने हर पहलू को छूआ ही नहीं अच्छी तरह से मथा भी है आप लोगो को अन्य आचार्यों की कृति को शुरुआत मे स्वाध्याय में नहीं लेना पहले आचार्य श्री समतंभद्र महाराज की कृतियों का स्वाध्याय करना


आचार्य कुंद कुंद भगवन ने समयसार में अपने हिसाब से दुकान में माल रखा ग्राहक के हिसाब से नही इसलिए दुकान नहीं चलेगी दुकान चलाना है तो ग्राह्रक के हिसाब से माल रखना पडेगा पुण्य को हेय करने वाले की दुर्दशा होगी. क्योकि उन्होने पुण्य की उपेक्षा करी है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312


