,यदि”किसी धर्मी के द्वारा कोई गलती हो जाए तो उस गलती को सुधारने की कोशिश करो न कि उसका प्रचार प्रसार करो” प्रमाण सागर महाराज
भोपाल
“धर्म भले ही वैयतिक स्तर पर होता है,लेकिन वह “व्यवहार” में भी दिखना चाहिये”उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने “संस्कार उपवन” के प्राईड सभाग्रह में व्यक्त किये।प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया मुनिश्री संघ सहित बाबड़िया कला से मंगल विहार करते हुये “संस्कार उपवन” प्राइड में आए यहां पर तीन दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन है जिसमें संपूर्ण भारत एवं विदेशों से विशिष्ट मुनिभक्त श्रद्धालु तथा गुणायतन के राष्ट्रीय पदाधिकारी पधारे है।
मुनिश्री ने “सम्यकदर्शन”के आठों अंग की विस्तृत व्याख्या करते हुये कहा कि धर्म कोवैयक्तिक,व्यवहारिक, आध्यात्मिक, एवं सामाजिक चारों स्तर पर समझना पड़ेगा जैसे “दिया” स्व प्रकाशित होता है,लेकिन जब वह जलता है तो उसके आभामंडल में जो भी आता है वह भी प्रकाशित हो जाता है,उसी प्रकार आप व्यक्तिगत स्तर पर पूजापाठ, दान धर्म,त्याग संयम,वृत अनुष्ठान,करते हो,उसकी छाप व्यवहारिक स्तर पर भी परिलक्षित होंना चाहिये, यदि आपके जीवन में अहिंसा, करूणा,मैत्री,क्षमा,धैर्य,सहिष्णुता,संयम,संतोष,और समता परिलक्षित नहीं हो रही है,तो यह मानकर चलना चाहिये कि आपके अंदर अभी धर्म का दिया जला ही नहीं।

जिसके हृदय में धर्म धारण हो जाता है,उसके व्यवहार में भी परिवर्तन आ जाता है “धर्म”सिर्फ एक क्रिया नहीं है, एक धर्मी व्यक्ती के व्यवहार में विनम्रता शालीनता,संयम,तथा सदाचार का होंना आवश्यक है।भगवान महावीर ने धर्म को व्यक्तिक,व्यवहारिक,आध्यात्मिक, सामाजिक, चारों स्तर पर व्याख्या की है,मुनि श्री ने कहा कि शास्त्रीय भाषा में धर्म का मूल रत्नत्रय अर्थात सम्यक् दर्शन,सम्यक् ज्ञान,तथा सम्यक् चारित्र है,बचपन से ही हम लोग सुनते आये है कि बिना “सम्यक् दर्शन” के जीवन में धर्म घटित नहीं हो सकता उन्होंने सम्यक् दर्शन के आठों अंग- निशंकित,निश्कांक्षित,
निर्विचिकित्सा,अमूड़दृष्टी, ये चार प्रारंभिक अंग है,जो कि व्यक्तिगत एवं आध्यात्मिक स्तर पर प्रत्येक धर्मी के अंदर बहुत जरूरी है, “आत्मा” अजर अमर अविनाशी है, यह धारणा जिसके हृदय में निशंकित रूप से समा जाती है वह भय,चिंता, शोक,अवसाद, हताशा सभी प्रकार की दुर्बलताओ से मुक्त होकर आध्यात्मिकरुप से परिपक्व हो जाता है।
उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत जीवन में संयम और सदाचार बहुत आवश्यक है निश्कांक्षित अंग हमें विषयों की प्रगाढ़ता से बचाकर निष्काम योगी बनाता है।निर्विचिकित्सा अंग हमें भावों की विकृतियों से बचाता है, “अमूढ़ दृष्टि”अंग का पालन करने वाला “अंधविश्वास” का शिकार नही होता तथा आत्मा का अटल श्रद्धानी होता है, इसके पश्चात जो चार अंग है उसमें उपगूहन, स्थितिकरण, वात्सल्य,प्रभावना ये हमारे व्यवहारिक और सामाजिक धर्म को प्रभावित करते है,उन्होंने कहा कि व्यवहारिक जीवन में हमें धर्मी के गुणों का अनुरागी तथा उसके दोषों को ढंकने की चेष्टा करना चाहिये,यदि”किसी धर्मी के द्वारा कोई गलती हो जाए तो उस गलती को सुधारने की कोशिश करो न कि उसका प्रचार प्रसार करो।

मुनि श्री ने कहा ” धर्म और समाज एक दूसरे के पूरक है धर्म समाज को अनुशासित करता है,वही समाज धर्म को संरक्षित करता है”आचार्य समन्तभद्र स्वामी ने कहा है कि “धर्मात्मा के बिना धर्म नहीं टिक सकता” यदि तुम धर्मी हो तो दूसरे धर्मात्माओं का भी ख्याल रखो।


मुनि श्री ने कहा कि आज यहा पर बहुत अच्छा संयोग बना है, देश के प्रबुद्ध और श्रेष्ठीजन यहा उपस्थित है उन्होंने कहा कि पिछले दिनों हमने एक संदेश दिया था जैन बनाओ,
जैन बढ़ाओ,जैन बचाओ, जैन बसाओ,उसी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुये यंहा मंथन और विचार विमर्श होगा, जिससे एक अच्छा नवनीत निकलेगा जो पूरी समाज की सेहत को अच्छा बनाएगा जिसकी आज महती आवश्यकता है,उन्होंने साधर्मी वात्सल्य की बात करते हुये विष्णुकुमार मुनिराज का उदाहरण देते हुये कहा कि वह तो अपनी आत्मिक साधना में लीन थे लेकिन जब धर्म पर संकट आया तो उन्होंने अपने पद कि चिंता न करते हुये व्यवहारिक,और सामाजिक दायित्व का निर्वाहन किया। उन्होंने समयसार के रचयिता आचार्य कुंद कुंद जैसे महान आचार्यों की चर्चा करते हुये कहा जिन्होंने अपने ध्यान साधना में से समय निकाल कर जो अमृत और मार्ग हम लोगों को दिया उस मार्ग को सुरक्षित पहुंचाना अब हम सभी लोगों की जिम्मेदारी है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312


