सेठ हीराचंद नेमचंद स्मारक ट्रस्ट दिगंबर जैन मंदिर, छात्रावास और भूमि बचाओ आंदोलन

धर्म

सेठ हीराचंद नेमचंद स्मारक ट्रस्ट दिगंबर जैन मंदिर, छात्रावास और भूमि बचाओ आंदोलन

पुणे 

 HND बोर्डिंग की सम्पूर्ण भूमि 12018 वर्ग मीटर यानी 129361 वर्ग फुट भूमि बिल्डर को बेची जा रही है और यह भूमि मेट्रो लाइन से 500 मीटर के अंतर्गत होने के कारण इस भूखंड को 4 FSI के कंस्ट्रक्शन की अनुमति मिलती है यानी भूमिक्षेत्र से चार गुना 517444 वर्ग फुट का कंस्ट्रक्शन हो सकता है और यहां नए फ्लैट का बाजारमूल्य लगभग 20000 रुपये प्रति वर्ग फुट का है (जो ज्यादा एमेनिटीज होने के कारण बढ़ भी सकता है) तो कुल कीमत 1034,88,80,000 (रुपये 1034 करोड़ अठासी लाख अस्सी हजार) आती है जिसे सिर्फ़ 230 करोड़ रुपये में बेचा जा रहा है और बदले में 10000 वर्ग फुट ज़मीन पर 40000 हज़ार वर्ग फुट के छात्रावास के इमारत का निर्माण बिल्डर की तरफ से मिलेगा

 

 

 

📲इस गणित को आप कैलकुलेटर पर करेंगे तो सामान्य कैलकुलेटर भी गुणाकार नहीं कर पाता इतना बड़ा बाजार मूल्य इस जमीन का है।

 

*📲 धर्मादाय आयुक्त द्वारा यह रकम FD में रखने के निर्देश दिए गए हैं और उनकी अनुमति के बिना यह FD को तोड़ नहीं सकते लेकिन उसका ब्याज ट्रस्ट के कार्यों के लिए कर सकते हैं। अब एक और गणित लगाए कि 230 करोड़ पर 7 टके FD ब्याज दर के अनुसार 16 करोड़ 10 लाख का ब्याज प्रतिवर्ष मिलेगा। क्या छात्रावास का इतना खर्चा होता है जो इतने रकम की आवश्यकता प्रतिवर्ष पड़े❓इतना पैसा आएगा तो उसके व्यय सही जगह हो रहा है या निजी स्वार्थ के लिए हो रहा है इसपर कौन ध्यान रखेगा ❓ऊपर से इतने पैसों पर कितना TDS कटेगा ❓ये सब विचारणीय प्रश्न है*

                       

*😢एक दानी व्यक्ति ने यह भूमि वर्ष 1958 में एक सार्वजनिक ट्रस्ट के ज़रिए छात्रावास, धर्मशाला आदि धार्मिक कार्यों के लिए समाज को दान कर दी थी। जिसे धर्मादाय आयुक्त ने एक फ़र्ज़ी, झूठी ऑर्डर तैयार करके एक बेहद मज़बूत पत्थर से बनी होस्टल की इमारत को जर्जर बताते हुए उसे तोड़ने और सम्पूर्ण भूमि बिल्डर को बेचने की अनुमति दे दी और बिल्डर इस भूमि पर 15 मंजिले अनेक टॉवर बनाएगा जो ट्रस्ट के मूल उद्देश्यों के विपरित है

 

उक्त भूमि पर १००८ श्री वर्धमान भगवान का जिनालय बना हुआ है जो छात्रावास के साथ ही बनाया गया था। मूल बात तो ये है कि ट्रस्ट और बिल्डर के बीच जो करारनामा हुआ है उसमें मंदिर का उल्लेख न करके उसे prayer hall ये संज्ञा दी गई है यानी भविष्य में prayer hall हटाना तो बहुत आसान है मंदिर लिखते तो हटाना कठिन हो जाता

 

छात्रावास, धर्मशाला आदि के उद्देश्य से बना हुए ट्रस्ट की भूमि का उपयोग केवल ट्रस्ट के उद्देश्यों के लिए होना चाहिए। *ट्रस्ट डीड में कही भी ट्रस्ट की भूमि बेचने का अधिकार ट्रस्टी को नहीं दिया गया।* 

 

ट्रस्ट डीड के अनुच्छेद 5 के प्रावधान निम्नलिखित है

*(5) If any person* shall at any time hereafter offer to add to the Trust fund hereby settled whether by transfer of any immovable or movable property or of Government or other Securities or payment of cash in aid of any of the objects of -the Charity hereby established, it shall be lawful for the Trustees to accept the same upon such terms and conditions not inconsistant with any object of the Charity hereby constituted as the said Trustees may determine Provided that in no case shall the name of the Charity hereby created be altered in any manner whatever or its declared aims and objects departed from.

 

*➡️उपरोक्त प्रावधान का अर्थ*

उपरोक्त प्रावधान में *If any person* लिखा है अर्थात यदि कोई बाहर का व्यक्ति ट्रस्ट फण्ड बढ़ाने के लिए ट्रस्ट के नाम पर कोई चल अचल संपत्ति को ट्रस्ट को हस्तांतरित करना चाहता है तो ट्रस्टी उसे ट्रस्ट के उद्देश्यों के लिए स्वीकार कर सकते हैं। *यानी ये जो एकमात्र चल अचल संपत्ति हस्तांतरित करने का प्रावधान है वो केवल बाहर के अन्य व्यक्ति की अपेक्षा है जो स्वयं की संपत्ति ट्रस्ट फण्ड बढ़ाने के उद्देश्य से ट्रस्ट को ट्रांसफर करना चाहता है तो ट्रस्टी उसे स्वीकार कर सकते हैं। इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि ट्रस्टी को ट्रस्ट की संपत्ति बाहर वाले को बेचने का अधिकार है। यानी ये ट्रस्ट की भूमि जो बिल्डर को बेची गई है ये पूर्णतः अवैध है। क्योंकि आगे चलकर बिल्डर उस भूमि पर 15 मंजिला अनेक निवासी फ्लैट्स अथवा व्यवसायिक कार्यालय के टॉवर बनाएगा और छात्रावास को भूमि के एक कोने में मंदिर के बाजू में बनाकर आज के बृहद जगह पर स्थित छात्रावास को एक 15 मंजिला इमारत में संकुचित कर देगा जो ट्रस्ट के मूल उद्देश्य के बिल्कुल विपरीत है।

 

 यदि ट्रस्ट के उद्देश्य का पालन करना था तो छात्रावास का विस्तार करना चाहिए था जो वर्तमान में 250 छात्रों के लिए बना था उसे 500 छात्रों के लिए बनाना चाहिए था लेकिन यहां तो 250 से घटाकर नए इमारत में केवल 200 छात्रों के लिए ही छात्रावास बनाया जा रहा है जो ट्रस्ट के मूल उद्देश्य के बिल्कुल विपरीत है। उसके अलावा लड़कियों के लिए भी छात्रावास बना सकते थे लेकिन जब जमीन ही बेचने की तैयारी चल रही है तो लड़कियों के छात्रावास की कोई संभावना नहीं। ट्रस्ट डीड में तो धर्मशाला बनाने तक के प्रवधान है वो भी भूमि के अभाव में दिवास्वप्न के समान अधूरा ही रह जाएगा।*

 

इस ट्रस्ट की भूमि पर 200 से अधिक बड़े छोटे पेड़ पौधे है जिन्हें बिल्डर द्वारा काट दिया जाएगा यानी ये पर्यावरण का भी बड़ा नुकसान होने जा रहा है।

 

 

 ज्ञात रहे कि इस भूमि का अभी केवल अग्रीमेंट टू सेल ही ट्रस्ट और बिल्डर के बीच बना है जिससे भूमि का मालिकाना अधिकार बिल्डर को हस्तांतरित नहीं होता। जब भूमि का सेल डीड बनेगा तभी जाकर भूमि का मालिकाना अधिकार हस्तांतरित माना जाता है। अतः इस दुर्घटना को टालने के लिए अभी भी पर्याप्त समय है। वैसे भी धर्म के लिए समर्पित द्रव्य भूमि इत्यादि निर्माल्य की कोटि में आता है और जो भी इसका उपभोग धर्म से विपरीत अन्य कार्यों के लिए करता है उसे निर्माल्य भक्षण का दोष लगता है जिसके अनेक जन्मों तक बहुत भयंकर परिणाम भोगने पड़ते हैं ऐसा जिनागम में स्पष्ट उल्लेख आया है।

 

 बिल्डर द्वारा षड्यंत्र तो ये किया गया है कि पहले ट्रस्ट की पूरी भूमि खरीद लेगा और बादमे ट्रस्ट को 10000 वर्ग फुट जमीन पेरपेचुअल लीज तत्व पर देगा यानी ट्रस्ट भूमि के मालिक से किरायदार बन जाएगा और बिल्डर को प्रतिमाह या प्रतिवर्ष लीज रेंट देना पड़ेगा। फिर यदि लीज डीड के किसी प्रावधान का भंग ट्रस्ट द्वारा होता है तो लीज डीड निरस्त भी किया जा सकता है यानी ट्रस्ट को भूमि विहीन किया जा सकता है। निजी स्वार्थों को साधने के लिए 129361 वर्ग फुट भूमि के मालिक से 10000 वर्ग फुट भूमि का किरायदार बनना यह मायाचारी की पराकाष्ठा है लेकिन कर्मों के हिसाब में कभी गलती नहीं होती। अतः समय रहते सावधान हो जाए*

 

    धर्मो रक्षति रक्षितःसत्यमेव जयते

 

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