आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में दो दिवसीय जैन दाम्पत्य सेमिनार का शुभारभ 20 को 

धर्म

आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में दो दिवसीय जैन दाम्पत्य सेमिनार का शुभारभ 20 को 

रामगंजमंडी परम पूज्य आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में दो दिवसीय जैन दाम्पत्य सेमिनार का आयोजन होगा जिसका शुभारभ 20 सितंबर को होगा जिसमें लगभग 135 से अधिक युगल भाग लेंगे इस सेमिनार में दो दिन में चार सत्र होंगे इसमें गृहस्थी और धर्म में सामंजस्य के साथ परिवार में संस्कार एवं आपसी मेलजोल के विषय पर समझाया जाएगा। जिसको लेकर तैयारियो को अंतिम रूप दे दिया गया।

 

 

 

 

शुक्रवार की बेला में धर्म सभा में सर्वप्रथम मुनि श्री 108 प्रांजल सागर महाराज ने अपने मंगल प्रवचन में कहा कि यह संसार परिवर्तन का नाम है और प्रति समय परिवर्तन होता है कुछ स्थाई और कुछ क्षणभंगुर है मनुष्य पर्याय में स्थाई परिवर्तन प्रति समय होता है। संसार में जाने से पहले अपने आप को सही करने और आत्मा में परिवर्तन करने आत्मा का पराभव कर लेंगे तो जीवन सार्थक होगा।

 

इस बेला में आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज ने मोक्ष पुरुषार्थ पर प्रकाश डाला उन्होंने कहा कि मोक्ष शब्द कितना प्यारा शब्द है जो मरघट के बाहर भी लिखा होता है। और शास्त्रों में भी लिखा रहता है। लेकिन जो मरघट के बाहर लिखा है उसे हम नहीं चाहते और जो शास्त्रों में लिखा है उसे हम चाहते हैं। क्योंकि मरघट के बाहर जो मोक्ष लिखा है वह संसार के पर्याय से छूटने का मोक्ष लिखा है और जो शास्त्रों में लिखा है वह कर्मों से छूटने का मोक्ष लिखा है। हम मर जाएंगे सब यही छूट जाएगा। लेकिन कर्म ही छूट जाएगा तो कुछ प्राप्त करने की आकांक्षा ही नहीं रहेगी। ऐसा कुछ मिलेगा जिसके सामने सबकुछ फीका होगा।

 

    मोक्ष के रास्ते पे चलने के लिए पहले व्यसनों को छोड़ना पड़ता है 

    आचार्य श्री ने कहा कि यदि मोक्ष के रास्ते पर चलना है तो सबसे पहले सप्त व्यसनों को छोड़ना पड़ता है। और अष्ट मुलगुणों को धारण करना पड़ता है। बहुत छोटा सा रास्ता है। नदी के उदगम का उदाहरण देते हुए कहा कि उस जगह इतनी छोटी सी धारा में बहती है जैसे नल खुला हो आगे जाकर देखते हैं तो कितने विशाल रूप में वह बहती है। उसी प्रकार मोक्ष भी सप्त व्यसन के त्याग से शुरू होता है। पहले थोड़ा थोड़ा छोड़ना बाद में सब कुछ छोड़ देना। यही मोक्ष का क्रम है। धर्म पुरुषार्थ और मोक्ष पुरुषार्थ एक साथ चलते हैं। हमारे संपूर्ण कर्मों का क्षय होना मोक्ष है। जीवन में हमें ऐसे कार्य करना चाहिए उद्वेश्य बनाना चाहिए जिससे हमारे कर्मों का क्षय हो।

            

         माता पिता का यह लक्ष्य होना चाहिए कि संतान को पहली प्रेरणा मोक्षमार्ग की देंगे

   आचार्य श्री ने कहा कि संतान उत्पति का पाप कब नहीं लगता जब माता पिता इस उद्वेश्य से संतान पैदा करे की मैं पहले उसे मोक्ष का मार्ग दिखाउंगा। ऐसा करने में पुण्य लगता है। माता पिता इस उद्वेश्य से संतान उत्पति करते हैं कि यह व्यापार करेगा नौकरी करेगा हमारा सहारा बनेगा यह उद्वेश्य संतान उत्पति में पाप ही पाप है। बनना नहीं बनना संतान पर निर्भर करता है। माता पिता का यह लक्ष्य होना चाहिए कि पहले प्रेरणा हम संतान को मोक्ष मार्ग की देंगे। इस उद्देश्य से संतान उत्पति की जाती है तो वह धर्म माना जाता है। उद्देश्य की पूर्ति करते हुए यह दृष्टि रखना चाहिए जो मेरे द्वारा कृत्य किया जा रहा है सही है या गलत है। पहले विचार कर ले सही है या गलत यदि विचार करके किया जाता है तो कार्य गलत नहीं होता।और सही कार्य बहुत अच्छे से हो जाता है। यदि आप अपने बच्चों के कल्याण की भावना नहीं कर रहे हैं तो दूसरे के बच्चों की कल्याण की भावना बनावटी है। 

            सबसे ज्यादा यदि हम संस्कार ग्रहण करते हैं तो गर्भ में करते हैं।

  आचार्य श्री ने बच्चे के जैसे गर्भ में संस्कार होते हैं वैसी ही उसकी प्रवृति बनती है 9 महीने किसी को ट्रेनिंग देनी हो तो बहुत होते हैं। सबसे ज्यादा यदि संस्कार हम ग्रहण करते हैं तो गर्भ में करते हैं। क्योंकि जब तक हम गर्भ में तब तक बाहरी चकाचोध हमारे मन मस्तिष्क पर ज्यादा प्रभावी नहीं है। जैसे ही बाहर प्रकट होते हे वैसे ही बाहरी चकाचोध का प्रभाव शीघ्र पड़ने लगता है। जब संस्कार कूट कूट के पड़ते हैं तो मोक्ष पुरुषार्थ का भाव बनता है व्यक्ति मोक्ष पुरुषार्थ की और निकलता है। 

 

 

पुरुषार्थ में ताकत है भाग्य बदलने की 

  महाराज श्री ने कहा कि पुरुषार्थ में भी ताकत है भाग्य को बदलने की यदि पुरुषार्थ को हम विशुद्धि के साथ ले जाते है तो वह भाग्य को बदल देता है। और अग्नि भी नीर बन जाती है। सर्प भी हार हो जाएगा, सुली भी सिंहासन हो जाएगी। यदि हम अपनी विशुद्ध को बढ़ा ले तो भाग्य को दुख से सुख में परिवर्तित कर सकते हैं। पुरुषार्थ तीव्र गति के साथ करना चाहिए इतनी विशुद्धि के साथ करना चाहिए और देखना हमारा भाव सहज परिवर्तित हो गया। और तुरंत समस्या का समाधान हो जाएगा। 

 

   मोक्ष पुरुषार्थ के लिए तीन चीजें जरूरी है मेहनत, नियत और निर्णय 

   आचार्य श्री ने कहा कि मोक्ष पुरुषार्थ एक साथ नहीं होता धीरे-धीरे संस्कार बढ़ जाते हैं तब जाकर हम मोक्ष पुरुषार्थ में लग पाते है। मोक्ष पुरुषार्थ के लिए तीन चीजे जरूरी हैं मेहनत, नियत और निर्णय होना चाहिए साफ सुधरी सोच भाव होना चाहिए यहां पर यह विचार बनाना जो सत्य है वह सत्य है। सत्य बोलना सत्य का विचार करना मोक्ष पुरुषार्थ में जरूरी है। दृष्टि को पवित्र करो दृष्टि को पवित्र बना लोगे तो कुछ भी छोड़ने की जरूरत ही नहीं है। गृहस्थ जीवन में मोक्ष पुरुषार्थ को करना है तो सबसे पहले सोच और दृष्टि को संभालना होगा यह होगा तो तब तपस्या साधना की ओर बढ़ जाते हैं विश्वास करना मजबूती है। अति विश्वास करना मजबूती नहीं है विश्वास तो करो लेकिन अतिविश्वास नहीं। आजादी स्वतंत्रता हमें भी तो बाहर निकलना है शरीर के ऐसा शरीर से निकले कि दोबारा शरीर में न आए। मोक्ष पुरुषार्थ का मतलब है कि लक्ष्य तय करना धीरे-धीरे छोटे कदमों से धीमी गति से ही सही उस और बढ़ने लग जाएंगे। जब आपका सोच विचार सही होगा तब ऐसा कदम आपका आगे बढ़ेगा।

    अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

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