नरभव की प्राप्ती इस लोक में सबसे अधिक दुर्लभ है-मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज

धर्म

नरभव की प्राप्ती इस लोक में सबसे अधिक दुर्लभ है-मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज
बाबड़िया कला (भोपाल)
जीवन में अच्छे संयोग बहुत दुर्लभता से मिलते हे,वह लोग बड़े भाग्यशाली है,जिन्हें अच्छा योग मिलता है,और वे लोग बड़े भाग्यहीन है,जो अच्छे योग का अच्छा प्रयोग नहीं कर पाते उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने बाबड़िया कला में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किये।

 

 

मुनि श्री ने कहा योग मिलना भाग्य है,और योग का सही प्रयोग करना सौभाग्य है,योग का दुरुपयोग करना हथभाग्य है,और योग का सही प्रयोग न करना दुर्भाग्य है,

 

मुनि श्री ने भाग्य-सौभाग्य- -हथभाग्य,और दुर्भाग्य की गहराई से चर्चा करते हुये कहा कि आप लोग बड़े भाग्यशाली हो, इस प्रवास में तीसरी बार बाबड़िया कला को यह प्रबल योग मिलने जा रहा है मुनि श्री ने कहा कि तुम लोगों का पुण्य और सौभाग्य है इसमें कोई संशय नहीं परीक्षा से डरते वह लोग है जो पढ़ाई कम करते है जो अच्छी पढ़ाई करते है वह तो कहते है कि आप जैसी चाहे परीक्षा ले लो भाग्य” को जीवन के विभिन्न संद्रभों देखो और विचार करो कि मेंने भाग्य से क्या क्या पाया? यदि सच्चे अर्थों में देखा जाये तो पूरी सृष्टि में सबसे ज्यादा भाग्यशाली हम लोग है क्योंकि नरभव की प्राप्ती इस लोक में सबसे दुर्लभ है। उन्होंने शास्त्रीय भाषा में बात करते हुये कहा कि मध्यलोक के संपूर्ण जीव राशियो में मनुष्यों की संख्या 29 अंक प्रमाण है तो मनुष्य होना ही अपने आप में सौभाग्य है, उन्होंने कहा कि सभी लोग अपने अपने भाग्य की सराहना कीजिये और जोर से बोलिये कि मैं भाग्यशाली हुं जो मुझे
अहिंसा मूलक धर्म के साथ ऐसे परिवार में जन्म मिला जहा पीढ़ियों से शुद्ध आचार विचार की परिपाटी है,जिनके डी. एन. ए. में अहिंसा के संस्कार कूटकूट कर भरे है,
मैं सौभाग्यशाली हुं कि इस भरे पूरे परिवार के साथ मुझे स्वस्थ शरीर,अच्छी बुद्धि,
अच्छे संस्कार,के साथ धनी,सभ्य नागरिक,और
धन संपन्नता मिली है,इन सबके साथ पास में ही “धर्मायतन” मिला है। जहा गुरुओं का सानिध्य हमेशा मिलता रहता है तो आप सभी लोग अपने अपने भाग्य और सौभाग्य के लिये तालियां बजाइये।

मुनि श्री ने कहा कि इस धरती पर ऐसे भी मनुष्य है जिनको जन्म तो मिल गया लेकिन बचपन से ही संस्कार हीन रहे और कही अपंगता है तो कही इतनी अधिक गरीबी है कि सुबह की रोटी है तो शाम की नहीं कही वह हिंसा में लिप्त है,तो कही वह भीख मांग रहे है कही हीन बुद्धि है, तो कही अपराधी प्रवृति के कारण लुच्चे लफंगे बने जेल के सींखचों मे बंद है, मुनि श्री ने कहा कि आपको जो सौभाग्य मिला है,वह यूं ही नहीं मिला इसके पीछे भी आपने अपने आपको खपाया है।

“अनुकूल संयोग” पूर्व जन्म की तपस्या और अच्छे कर्मों का प्रतिफल है’ लेकिन यह संयोग आगे भी मिलते रहेंगे यह जरूरी नहीं” मुनि श्री ने उदाहरण देते हुये कहा कि मान लीजिये आप के हाथ में “हीरामणी”है और आप वह आपके हाथ से छिटककर किसी समुद्र में गिर जाये तो क्या आप उसे दोबारा प्राप्त कर सकते हो? जबाब मिला नहीं तो यह समझने की बात है,कि जो कुछ भी आपको मिला है वह तुम्हारा भगवान से कोई पूर्व कांटेक्ट नहीं है, यह आपका अपना पूर्व का पुरुषार्थ है,जो आज भाग्य बना है उसी प्रकार वर्तमान का पुरुषार्थ ही आपका भावी सौभाग्य बनेगा।

 

मुनि श्री ने कहा कि योग तो मिला उसका हमने प्रयोग क्या किया? स्वस्थ शरीर मिला उसे त्याग तपस्या में लगाओ यह इसका प्रयोग है,धन संपत्ति पाई उसका उदारता और सत्कर्मों में लगाया यह प्रयोग है यदि इसको सुरा सुंदरी में लगा दिया यह इसका दुरुपयोग है बुद्धि पाई उसको स्व और पर हित में लगाया यह इसका सदुपयोग और उसी बुद्धि को दूसरों को लडा़ने में लगा दिया तो यह दुरूपयोग है मुनि श्री ने कहा कि महत्वपूर्ण यही है कि हम अपनी शक्ती,संसाधनो का उपयोग कर रहे या दुरुपयोग?

 

अपने भाग्य को नष्ट कर देना हथभाग्य है,और खोटा भाग्य पाना दुर्भाग्य है, मुनि श्री ने कहा कि जो व्यक्ति मेहनत के साथ अपने धन को कमाता है तो एक एक रुपया समझदारी से खर्च करता है खर्च करने में तो आपकी समझदारी है लेकिन यह जो मनुष्य भव मिला है उस भव का किस प्रकार सदुपयोग करना चाहिये यह समझदारी भी आपके अंदर आना चाहिये कि मेरे भाग्य से जो समय शक्ती और संसाधन मिले है वह वेस्ट न हों यह समझदारी यदि आ गई तो आप अपने भाग्य को सौभाग्य में बदल सकते है।

 

मुनि श्री ने कहा कि अपने अपने अंदर में उतर कर देखिये और स्वयं का परिक्षण स्वयं कीजिये की हम अपने इस जीवन में कितने खरे उतरे है? मुनि श्री ने कहा कि कोई शुभ कर्म है जो आज आप सभी सौभाग्यशाली बने हो मुनि श्री ने कहा कि जो अपनी धन संपदा का उपयोग करता है वह राम के समान जगत पूज्य बनता है और जो अपनी पुण्य संपदा का दुरूपयोग करता है वह रावण के समान इस लोक में तो निंदा का पात्र बनता ही है,परलोक में भी दुर्गति का पात्र बन कष्टों को भोगता है” यह जो आपको सौभाग्य के क्षण मिल रहे है और आगे भी श्री सिद्धचक्र विधान के रुप में मिलने वाले है उनका सदुपयोग कीजिये बाबड़िया कला वाले सुनो यह योग जो मिला है,वह बार बार नही मिलने बाला अत अवसर का लाभ सभी को उठाना है।

 

प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया प्रातःकाल मुनि श्री अवधपुरी से विहार करते हुये बाबड़ियाकला में आये एवं यही पर प्रवचन हुये तथा आहार चर्या संपन्न हुई।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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