88 वर्षीय 108 मुनि श्री चिन्मय सागर जी आचार्य संघ सानिध्य में अतिशय क्षेत्र टोंक में देह पंचतत्व में लीन
टोंक राजस्थान तेरी छत्रछाया भगवन मेरे सिर पर हो ,मेरा अंतिम मरण समाधि तेरे दर पर हो बिरले आत्मा जो धर्मात्मा बन कर वैराग्य धारण कर दीक्षा संयम के मंदिर पर संलेखना का कलशारोहण कर परमात्मा बनने की राह पर अग्रसर होते हैं। अनेक साधुओं की जन्म भूमि ,दीक्षा भूमि, समाधि भूमि टोंक में मुनि श्री चिन्मय सागर जी का 16 सितंबर शाम को समाधि मरण होने से विमानयात्रा चकडोला 17 सितंबर को प्रातः 6 बजे निकाला गया। दिन रात मेरे स्वामी, में भावना यह भावु ।देहांत के समय मे तुमको न भूल जावू।मरण समय गुरु पाद मूल हो संत समूह रहे ,पंडित पंडित मरण हो ऐसा अवसर दो।इन सारगर्भित भावनाओ को बिरले ही भव्य जीव अपने जीवन मे चरितार्थ करते है ।
चतुर्थ पट्टाधीश आचार्य श्री अजितसागर से वर्ष 1989 में दीक्षित 88 वर्षीय उदयपुर निवासी मुनि श्री चिन्मय सागर जी ने आचार्य श्री वर्धमान सागर जी से निवेदन कर 13 सितंबर को चारों प्रकार के आहार का त्याग कर यम संलेखना ग्रहण की।

आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के श्री मुख से अरिहंत सिद्ध सुनते हुए 16 सितम्बर को समाधिमरण हुआ क्षपक समाधिस्थ मुनि श्री चिन्मय सागर जी का डोला विमान यात्रा वात्सल्य वारिघि पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघ सानिध्य में निकाली गई। मुनि श्री के डोले के आगे कमंडल लेकर भूमि शुद्धि का सौभाग्य परिजनों को प्राप्त हुआ। कंधे लगाने का सौभाग्य परिजनों के साथ समाज को प्राप्त हुआ वैराग्य दर्शन समाधिस्थल परिसर में मंत्रोचार से स्थल शुद्धि की गई। मुनि श्री कीपूजन,शांतिधारा , पंचामृत अभिषेक उल्टेक्रम से प्रतिष्ठाचार्य पंडित श्री हंसमुख धरियावद के कुशल निर्देशन में गृहस्थ अवस्था के पुत्रों श्री ओमप्रकाश,श्री नरेंद्र, श्री ईश्वर श्री स्वाधीन श्रीमती सरला, श्रीमती उषा, श्रीमती दीपिका, श्रीमती आशा,श्रीमती सरला, श्रीमती उषा, श्रीमती दीपिका, एवं भौंरावत परिवार द्वारा किया गया। पुण्यार्जक परिवार द्वारा दान राशि की घोषणा की गई।
इस अवसर पर आचार्य श्री ने बताया कि उत्कृष्ट समाधि होने पर समाधिस्थ जीव अगले दो भव जन्म से 8 भव में निश्चित मोक्ष जाते हैं राजेश पंचोलिया इंदौर ने बताया कि उदयपुर के श्री जी ने उदयपुर में मुनि दीक्षा आचार्य श्री अजित सागर जी के सिद्धहस्त करकमलों से हुई आपका नाम श्री चिन्मय सागर जी किया गया। दीक्षा गुरु की वर्ष 1990 में समाधि के बाद से आप आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के संघस्थ है 36 वर्ष के संयमी जीवन में हजारों उपवास भी किए विगत 6 माह से सभी अनाज का त्याग कर एकांतर से आहार ले रहे थे। ऐसा लगता हैं कि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी द्वारा घोषित अतिशय क्षेत्र अब निर्वाण सिद्ध भूमि हो गया हैं जबसे आचार्य श्री का चातुर्मास 55 वर्षों के बाद हुआ हैं तबसे अनेक धार्मिक अनुष्ठान की धर्म रूपी गंगा कुआं स्वयं प्यासे के पास आ गया हो। समाज प्रवक्ता पवन कंटान एवं विकास जागीरदार अनुसार सकल जैन समाज एवं वर्षायोग समिति के तत्वाधान में आयोजित कार्यक्रम में टोंक नगर के अतिरिक्त निवाई,जयपुर,बोली, टोड़ारायसिंह, किशनगढ़,धरियावद पारसोला उदयपुर,इंदौर ,असम ,गोहाटी कलकत्ता सनावद मंगाना, देवली, मालपुरा आदि राजस्थान,मध्यप्रदेश आदि राज्यों से अनेक नगरों से 10000 से अधिक भक्त पधारे। संपूर्ण टोंक जैनमय हो गया। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघ की विगत माह सहित दूसरी समाधि हुई हैं। राजेश पंचोलिया इंदौर वात्सल्य वारिघि भक्त परिवार से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
