आज का युवा शराब पीना नशा करने को पाप ही नहीं मानता वह उसे आजकल का कल्चर समझता है, युवाओं में ऐसी मनोवृत्ति ही उनके जीवन का सत्यानाश कर रही है”-“पाप के परित्याग से ही जीवन का उत्थान होता है” मुनि श्री प्रमाण सागर

धर्म

आज का युवा शराब पीना नशा करने को पाप ही नहीं मानता वह उसे आजकल का कल्चर समझता है, युवाओं में ऐसी मनोवृत्ति ही उनके जीवन का सत्यानाश कर रही है”-“पाप के परित्याग से ही जीवन का उत्थान होता है” मुनि श्री प्रमाण सागर
(भोपाल)अवधपुरी

मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज एवं संधान सागर महाराज का चातुर्मास चल रहा है आधे से अधिक चातुर्मास का समय ब्यतीत हो चुका है प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया क्षमावाणी पर्व मनाने आयी गणिनी आर्यिका 105 सृष्टि भूषण माताजी संघ सहित अवधपुरी के विद्याप्रमाण गुरुकुलम् में विराजमान है ।

 

 

मुनि श्री ने प्रातःकालीन प्रवचन सभा में ग्रहस्थों के 12 अणुव्रतों को बहूत ही सरल तरीकों से समझाते हुये कहा कि कोईभी छोटे से छोटा ब्रत हो वह भी आपके जीवन में परिवर्तन ला सकता है,उन्होंने कहा कि आचार्य समन्तभद्र स्वामी ने “पाप के त्याग” में किसी त्यागी ब्रती का उदाहरण नहीं दिया बल्कि उस हिंसा करने वाले यमपाल चांडाल और मांसभक्षी भील को याद किया है, जिन्होंने मुनिराज के कहने से पूरे पापों का त्याग नहीं किया सिर्फ एक पाप का ही त्याग किया लेकिन दृणता से उसका पालन किया और तर गये,यमपाल चांडाल ने मात्र चतुर्दशी के दिन किसी को फांसी पर न चढ़ाने का प्रण लिया था वंही खादिरशाल भील ने सिर्फ कौवे के मांस का आजीवन त्याग किया था, लेकिन दोनों के जीवन में ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हुई कि उन्होंने मुनिराज को दिये बचन को भंग न कर अपने प्राणों को त्यागना उचित समझा और वह स्वर्ग में देव बने मुनि श्री ने कहा कि *”पाप के परित्याग से ही जीवन का उत्थान होता है”* पाप और पुण्य की स्थितियों की बात करते हुये कहा
“पाप करना, पाप बोलना,पाप काटना, पाप त्यागना है,तो उसी प्रकार पुण्य की भी चार स्थितियां है पुण्य करना,पुण्य भोगना,पुण्य चाहना,और जीवन को पुण्य बनाना मुनि श्री ने कहा कि जब तक दृणतः पूर्वक पापों का त्याग नहीं करोगे पापों का आगमन निरंतर चलता रहेगा और उन पापों को भोगना ही पड़ेगा,
पाप त्यागे विना पाप काटने की प्रकरिया हाथी स्नान है जैसे एक हाथी पोखर से बाहर निकलते ही अपनी सूड़ से धूल को अपने ही शरीर पर डाल लेता है।”जैन धर्म पाप काटने तक सीमित नहीं,जैन धर्म “पाप के त्याग को अपना धर्म मानता है “हिंसा झूंठ,चोरी, कुशील, परिग्रह यह पांच पाप है इन पांचों पाप को पूर्ण त्याग लो तो अतिउत्तम,नहीं त्याग सकते तो आप कम से कम संकल्पी हिंसा का त्याग करना ही चाहिये निर्णय कर लो कि हम जानवूझकर किसी का घात नहीं करेंगे दूसरा उन्होंने कहा कि *बच्चों को पीटो मत पीटने से वह ढींट बनेंगे जब कि उनको आंख दिखाओगे तो वह आज्ञाकारी और संस्कारी बनेंगे* उन्होंने कहा कि पीटना तो किसी को भी नहीं चाहिये नौकर चाकर हों या पशु हो किसी को बंधन में रखना पाप है,उन्होंने पंजाब वाढ़ घटना का जिक्र करते हुये कहा कि जो पशु बंधन में थे वह काल कवलित हो गये जो छुट्टा थे वह तैरते हुये अपनी जानबचाकर पाकिस्तान पहुंच गये इसी प्रकार पशुओं के साथ दुर्भावना पूर्वक किया गया व्यवहार जैसेअति भारारोपण,उनको समय पर चारा पानी नहीं दैना यह सभी पाप है *आप लोग तो प्रतिदिन गुरुओं के प्रवचन सुनते,पूजा पाठ,दान धर्म तथा उपवास करते फिर भी पाप करने से डर नहीं लगता?

 


इसका मतलब है कि आपको पापों में अनुरक्ति है,धर्म के प्रति सच्ची श्रद्धा और अनुरक्ति नहीं” अपने जीवन को पुण्य मयी बनाना चाहते हो तो पापों के त्याग के प्रति अभिरुचि को जगाना होगा उन्होंने कहा कि भले ही एक एक कदम चलो लेकिन त्याग की शुरुआत करो जिससे अधर्म करने से बचो उन्होंने उदाहरण देते हुये कहा कि ग्रीन सिग्नल पर गाड़ी न बड़ाओ चलेगा,पर रेड सिग्नल पर यदि गाड़ीआगे बड़ाओगे तो खतरा ही खतरा है,चालान कटेगा ही कटेगा

 

मुनि श्री ने कहा कि जिन जिन रास्तों पर भगवान ने चलने का निषेध किया उन रास्तों को दृणता पूर्वक त्यागो तभी अपने जीवन को पुण्य बना पाओगे

     संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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