सजा देने के लिए मोन व दुरी बना लेना बडी सजा–मुनि पुगंव श्री सुधासागरजी महाराज पुण्यार्जक परिवार ने किया कार्यकर्ताओं का सम्मान
अशोकनगर –जगत के सभी माता-पिता अपने बच्चों को संस्कार देने के साथ गलती करने पर सजा भी देते है और लाड भी करते हैं एक और माता है कर्म जो हमें अपने अच्छे बुरे कर्म ऐसी सजा देते हैं वह महसूस तो नहीं होती लेकिन उसके मार से कोई बच नहीं सकता कर्म मारता पीटता नही है जब हम गलती करने पर बस उनको ऐसी सजा देती है।
पहले आदमी को सजा के रूप मे काले पानी की सजा देते उनको अकेले आदमी को टापु पर छोडकर आ जाते थे ऐसे ही जो गरीब आदमी है. उनको प्रकृति कर्म ऐसे ही सजा देते है। भरत महाराज अपनी माता कैकयी हो सजा देने के लिए माता को माता नहीं कह कर महाराणी कहते थे कैकयी तडप गई कि भरत अपने मुंह से एक बार माता कह दे अतं में कैकयी ने अपनी भुल स्वीकार कर ली।यह उद्गार सुभाषगंज मैदान में विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि पुगंव श्री सुधासागरजी महाराज ने व्यक्त किए।

शिविर के कार्य को लोगों ने घर और मन्दिर से भी आगे मानकर किया*
इस दौरान श्रावक संस्कार शिविर के पुण्यर्जक शालू भारत संजीव श्रागर ने कहा कि हम सब के लिए श्रावक संस्कार के हर कार्य को कार्यकर्ताओं ने अपने घर और मन्दिर के काम से भी अधिक महत्वपूर्ण मानते हुए बहुत ही तन्मयता के साथ किया।


कर्म कि सज़ा ऐसी होती हैं कि व्यक्ति मर भी नहीं सकता और जीना भी मुश्किल है
उन्होंने कहा कि मैं क्या सुनूं बोलू क्या जानु संबंध जोड़ू नहीं जोड़ू इस बात पर विचार करना है ललितपुर पुलिस के एस पी सिन्धु थे वे रात को घूमने वाले को जंगल में छोड़ दिया करते थे तो सारे लोग मस्ती भूल गए ऐसे ही प्रकृति मां है जो ऐसे ही सज़ा देती है प्रकृति नशा करने वाले व्यसन करने वाले को गरीब बना देती तूने आंखो का दुरुपयोग किया उसकी सजा मे आंख से दिखना बंद हो जाता है कर्म की सजा ऐसी होती हैं कि व्यक्ति मर भी नहीं सकता और जी भी नहीं पा रहा इसलिए कभी मां को नाराज़ मत करना क्योंकि दुश्मन जब सज़ा देता है तो वह सहन हो जाती है लेकिन अपनों की सजा सहन नहीं होती ऐसे में मर भी नहीं पा रहे और जीना भी मुश्किल हो रहा था भरत जी ने कैकेई को मां कहना बंद कर दिया केकैई मां शब्द सुनते तड़प गई भरत बहुत बड़े नीतिज्ञ थे उन्होंने कुछ भी नहीं कहा बस महारानी कहना शुरु कर दिया चौदह वर्ष की सजा दी हमारे पूज्य गुरुदेव के पास भी ये कला थी गलती करने वाले से मौन ले लेते थे शिष्य तड़प जाता है बस इतना ही भरत महाराज ने किया उन्होंने कहा कि मैं मां के वात्सल्य से अपने आप को सज़ा कर रहा हूं घर में मां बाप बच्चों को क्या क्या कह देते हैं तो कोई बात नहीं लेकिन मेरे कारण से अपने आप को नहीं कोसोगे आप अपनी जिंदगी में कभी ऐसा सज़ा हो ऐसा मत करना।
जिसके लिए महापुरुष सोचते हैं उनका क्या कहना
उन्होंने कहा कि हमारे आचार्य श्री बहुत गजब थे जब हमारी दीक्षा हो रही थी तो आचार्य श्री ने कहा कि मैंने तुम्हारे लिए कुछ सोचा है महान आत्माएं प्रभु के संबंध में भगवान के संबंध में सोचते हैं मैं पतित पावन मैं अपावन ऐसे गुरु मेरे लिए सोच रहा है ऐसा पवित्र मन अपवित्र मन सोच रहा है एक ज्ञानी व्यक्ति अज्ञानी के संबंध में सोच रहा है कौन सोच रहा है गुरु हमने ये सुना गुरु ने सोचा है तो मैंने कुछ भी नहीं सोचा मैंने अपना सिर गुरु चरणों में रख दिया गुरु ने अपनी पिच्छिका मेरे सिर पर रख दी कभी कभी भाग्य जागता है गुरु हमारी चिंता करें मैं तो उसी दिन से रोमांचित हू इसलिए मैं दांवे के साथ कह सकता हूं कि मुझे गुरु की सिद्धि है गुरु के मुख से जो वचन निकल जाते हैं वह मंत्र बन गया अर्श वचन को बदला नहीं जाता आचार्य भगवंत ने कहा दिया तीसरा उदा ज्योतिष ने कहा कि गुरु के पास श्रीफल लेकर जाये जो उन्होंने कह दिया वह मंत्र बन गया। दूसरी जब ऐलक दीक्षा दी तीसरे बार इसरी में कहा परम सागर मैंने तुम्हारे बारे में कुछ सोच है गुरु से अधिक बुद्धिमान कभी बनना नहीं है महान विद्वान पुष्पदंत भूतबली ने गुरु वचनों को पालते हुए जैसा गुरु ने बताया वैसा ही किया।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312


