स्वप्न में भी यदि आत्महत्या का भाव आ जाए तो प्रायश्चित लेना चाहिए आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज
रामगंजमंडी
आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज ने मरण के प्रकार के विषय में प्रकाश डाला इच्छा मरण और अनिच्छा मरण के विषय में प्रकाश डालते हुए कहां की इच्छा में लोग आत्महत्या कर लेते है लोग जिसके आत्महत्या के भाव बन रहे हैं वह मिथ्या दृष्टि है सहन शक्ति नहीं होती है इसलिए ऐसे विपरीत भाव बनते हैं मुकाबला करने की ताकत नहीं होती, कमजोर होते हैं तो यह भाव बन जाते हैं मरना किसी समस्या का समाधान नहीं है समस्या को बढ़ाना है। क्योंकि जिस चीज से आपको पीड़ा है तकलीफ है वस्तु का अभाव है। वो कर्म नहीं मरने वाला है वह साथ में जाने वाला है मरने से कोई फायदा नहीं है यहां कर्म कम कष्ट दे रहा था वहां और ज्यादा देगा। उन्होंने कहा स्वप्न में भी यदि आत्महत्या का भाव आ जाए तो प्रायश्चित लेना चाहिए। और यदि साक्षात भाव बनाया तो कितने निकृष्ट परिणाम होंगे। जैन दर्शन व अन्य दर्शन भी कहता है कि आत्महत्या महापाप है। आत्महत्या करने की कभी मत सोचना।
कितनी भी परेशानी हो जिनेंद्र भगवान का दामन संभाल लो
आचार्य श्री ने कहा आपके जीवन में कितनी भी परेशानी हो जिनेंद्र भगवान का दामन संभाल लो देव शास्त्र गुरु के पास पहुंच जाओ। सब निपट जाएगा सब निपटेगा मरने से केवल उलझेगे सुलझेगे नहीं मरने से कष्ट बढ़ेंगे कम नहीं होंगे। जीना सीखो और मरने का तरीका सीखो। करने का तरीका सीख जाते हो तो आत्महत्या का भाव कभी नहीं बनेगा। छोटी छोटी चीजें धन का अभाव किसी ने कुछ कहा दिल पर लग गई बच्चा फैल हो गया व्यापार में सक्सेस नहीं मिली तो क्या मर जाएंगे मरना किसी समस्या का समाधान नहीं है मरने के अलावा और कई अवसर है कि आप जीवन को सही धारा में ले जाकर सही लक्ष्य तक पहुंचा सकते हैं। 


मरना तो नहीं चाहते लेकिन अकाल मरण हुआ यह अनिच्छा मरण है
अनिच्छा मरण को समझाते हुए गुरुदेव ने कहा मरना तो नहीं चाहते लेकिन अकाल मरण हुआ और अकाल मरण के निमित्त मिल गए है या सकाल मरण उपस्थित हो गया है तो मरना पड़ेगा वर्तमान परिपेक्ष पर गुरुदेव ने कहा कि वर्तमान समय अभी अच्छा नहीं चल रहा है क्योंकि बहुत हिंसाए हो रही है बहुत-बहुत जीव मर रहे हैं। और मनुष्य भी मर रहे हैं। आपको रोज प्रार्थना करनी चाहिए कि यह समय ऐसे निकल जाए जिससे जीवो को कम हानि पहुंचे। गुरुदेव ने कहा इस हेतु सभी को शांति मंत्र का जाप करना चाहिए। हम यही कर सकते हैं कि भावनाएं प्रेषित कर सकते हैं। 

भावनाओ में बहुत ताकत होती है
महाराज श्री ने कहा की भावना में बहुत ताकत होती है यदि सच्चे मन से प्रेषित की जाती है तो वह व्यक्ति के कष्ट पीड़ा को समाप्त करने में हेतु बनती है। सामूहिक भावनाएं तो और ज्यादा काम करती हैं बहुत ज्यादा काम करती हैं। 
अर्थी की शोभा मत बनो शोभा मोक्षमार्ग की बनो
अर्थी का उदाहरण देकर कहा कि अर्थी का कितना भी श्रृंगार किया जाए चंदन का श्रृंगार किया जाए दुनिया भर के साधन जुटा कर अर्थी को सजाया जाए लोग सिर्फ उसे अर्थी ही कहेंगे होगा क्या वह मरघट ही जाएगी। और अग्नि में ही रखी जाएगी। कोई भी यह नहीं देखेगा कि सोने की अर्थी है बस यही देखेगा की कौन मर गया। पहले अर्थी लकड़ी की बनती थी यह इस बात का सूचक थी कि जो कुछ भी है अब सब व्यर्थ है कितना भी श्रंगार कर दो अर्थी की शोभा मत बनो शोभा मोक्षमार्ग की बनो।
आचार्य श्री ने कहा जब तक हम मरण को नहीं समझेंगे तब तक हम मरण को नहीं सुधार सकते मरण पर मंथन करना मरने का भाव नहीं करना हमारा समय आएगा आयु पूर्ण होगी तो हम खुशी-खुशी जाए महामंत्र को जपते जपते जाएं और भगवान का नाम लेते जाएं तो निगोद से हम बच सकते हैं।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312


