आत्महत्या का सोचना और करना बहुत पाप है इससे अल्प आयु कर्म का बंध होता है आचार्य श्री वर्धमान सागर जी।         

धर्म

आत्महत्या का सोचना और करना बहुत पाप है इससे अल्प आयु कर्म का बंध होता है आचार्य श्री वर्धमान सागर जी।                    टोंक दशलक्षण पर्व में 10 दिनों तक धर्म की आराधना ,धर्म की पाठशाला अध्यात्म महापर्व में आपने क्या सीखा है? उत्तम क्षमा, मार्दव आर्जव, शौचधर्म से क्रोध, मान, माया और लोभ चार कषाय छोड़कर त्याग तप करने का संदेश उपदेश प्रवचन के माध्यम से आप सभी को दिया गया। आजकल हर परिवार में ऐसे अवसर आते हैं कि जब व्यक्ति अत्यधिक दुखी होता है और क्रोध में कुछ बोलता है या करता है क्रोध के कारण आत्म हत्या बको बोलना या करना महा पाप हैl रौद्र ध्यान के कारण आयु कर्म कारण नीचे गति का बंध होता है यहां तक की तीर्यच गति और नरक गति में भी जाना पड़ता है। यह मंगल देशना राजकीय अतिथि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने धर्म सभा में प्रगट की राजेश पंचोलिया के अनुसार आचार्य श्री ने आगे मुनिराज कीर्ति धर ,मुनि श्री सुकोशल ओर व्याघ्रनी की कथा के माध्यम से बताया कि अभी आर्यिका महा यशमति माता जी के द्वारा कीर्तिधर मुनि सुकोशल मुनि की कथा सबने सुनी । कीर्तिधर मुनि ने गृहस्थ अवस्था में पुत्र होते ही उसके मस्तक पर तिलक कर दीक्षा ले ली। उसी पुत्र ने विवाह के बाद मुनि को देखकर गर्भवती पत्नी के पेट पर तिलक कर दीक्षा ले ली। इस कारण गृहस्थ अवस्था की माता रौद्र ध्यान से मरकर व्याधनी बनी ओर ध्यानस्थ मुनि पुत्र के पैर का भक्षण करने लगी।उसी समय तप और ध्यान से मोक्ष हुआ जीवन अनमोल है हर समय सावधान सभी को रहना चाहिएlधर्म सभा में टोक जिले और बूंदी जिले के उपस्थित श्रावकों को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने आगे बताया कि आचार्य धर्म सागर जी महाराज जी ने गृहस्थ अवस्था में बूंदी जिले के गंभीरा में जन्म लेकर परिजनों के वियोग कारणकाफी संघर्ष किया।धर्म धारण करने से संयोग साधन मिलते हैं। मुनिश्री चंद्रसागर गुरु का सानिध्य पाकर उन्होंने व्रत और क्षुल्लक दीक्षा ली ।और बाद में आचार्य श्री वीर सागर जी महाराज से मुनि दीक्षा धारण की। वैराग्य दृढ़ता से होता हैं। पर्वो से कषाय ओर विषय कम कर धर्म का श्रवण ओर धारण कर चिंतन संयम वैराग्य से जीवन सार्थक होता हैं। आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व आर्यिका श्री महायश मति माताजी ने अपने धर्म देशना में बताया कि मुनि कीर्तिधर मुनि सुकौशल की कथा के माध्यम से बताया किवैराग्य कभी भी हो सकता हैं साधक का समता धन होता हैं मुनि श्री चिन्मय सागर जी की संलेखना समाधि चल रही हैं 6 माह से अन्न का त्याग कर एकांतर उपवास साधना चल रही हैं। रात्रि को शयन के पूर्व सभी को 5 पापों का त्याग करना चाहिए प्रातः उठकर णमोकार मंत्र का जाप करना चाहिएl प्रवचन के पूर्व आचार्य श्री शांति सागर जी एवं पूर्वाचार्यों के चित्र समक्ष दीप प्रवज्जलन बूंदी नगर के भक्तों एवं स्थानीय पदाधिकारियों ने कर आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन कर जिनवाणी भेंट की टोंक समाज द्वारा अतिथियों का सम्मान किया गया। राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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