थूबोनजी तीर्थ के वातावरण की महक अलग है–अक्षय सागरजी महाराज

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थूबोनजी तीर्थ के वातावरण की महक अलग है–अक्षय सागरजी महाराज
अशोक नगर–
अशोक नगर में विराजमान मुनि श्री अक्षय सागरजी महाराज ससंघ अशोक नगर से विहार करते हुए गुरुवार सुबह जिले के सबसे बड़े तीर्थ दर्शनोदय तीर्थ थूबोनजी पहुंचे।जहां कमेटी के साथ भक्तों ने मुनि संघ की अगवानी की।मुनि संघ को गाजे बाजे से तीर्थ में प्रवेश कराया गया। मुनि संघ की अगवानी कमेटी के परम संरक्षक संजीव श्रंगार, अध्यक्ष अशोक टिंगू, उपाध्यक्ष राकेश अमरोद, महामंत्री विपिन सिघई, मंत्री विनोद मोदी, राजेन्द्र हलवाई प्रचार मंत्री विजय धुर्रा, आडीटर राजीव चन्देरी, संयोजक शैलेन्द्र श्रृंगार, रिषभ कोरवास, सुनील दलाल, राहुल सिघई, अविनाशजैन, चन्देश जैन, सहित अन्य भक्तों ने की।


इस अवसर पर भक्तों को सम्बोधित करते हुए मुनि श्री अक्षय सागरजी महाराज ने कहा कि कुंडलपुर के महा महोत्सव के बाद एक महातीर्थ थुबोंनजी के इस महान पवित्र क्षेत्र पर पहुंचे है। तीर्थक्षेत्र की यात्रा महान पुण्य के उदय से होती है। दक्षिण से एक युवा देश भर में घुम घुम कर गुरु की खोज कर रहा था, गुरु की खोज का लक्ष्य लेकर निकला। जड़ तीर्थ की यात्रा बहुत की, लेकिन चेतन तीर्थ आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के चरणों की वंदना पहली बार थूबोनजी तीर्थ में की थी।बहुत परीक्षा लेने के बाद 1987 चातुमास में गुरु चरणों में अपना जीवन समर्पित कर यात्रा पूरी हुई।
आध्यात्मिक जन्म स्थली पर पहली बार पधारें है।
इसके पहले कमेटी के प्रचार मंत्री विजय धुर्रा ने कहा कि मुनि श्री अशोक नगर में महावीर जयंती सहित अन्य कार्य क्रमों में अपना सानिध्य देकर अपनी आध्यात्मिक जन्म स्थली पर पहली बार पधारकर हमें गौरवान्वित कर रहे हैं। महामंत्री विपिन सिघई ने कहा की मुनि श्री नेमीसागर जी, मुनि श्रीअचल सागरजी महाराज भी थूबोनजी पहली बार पधारें है। शैलसागरजी महाराज का सानिध्य हमें गत वर्ष मिला था।
बहुत ही रमणीय दृश्य है इस तीर्थ का सब ओर
मुनि श्री ने कहा की कही दिनो की यात्रा के बाद जब 1987में थुबोनजी क्षेत्र पर पहुंचे तो दशो दिशाओं में घनघोर जंगल था। आज भी वह सुगंध यहां के वातावरण में महक रही है। यहां देखा हमने कमेंटी ने बहुत विकास किया है।मन्दिर सभी ज्यों के त्यों है तीर्थ पर भक्तों के लिए बहुत सुविधाएं जुटाई गई है।
संस्मरण सुनाया
पूज्य मुनि श्री ने आचार्य श्री से जुड़ा एक संस्मरण सुनाया। उन्होनें कहा आचार्य श्री 1987 में वहुत बीमार हुए, लेकिन गुरु महाराज अपनी चर्या और धर्म का पालन में एक इंच भी फर्क आने नहीं देते थे। साधना करते हुए आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज को देखकर लगा कि हम तो चतुर्थ काल में आ गये। और गुरु को जीवन समर्पित करने के बाद हमने भी कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
*इतनी विशाल प्रतिमाऐ तो थुबोनजी तीर्थ में ही है
पूज्य मुनि श्री ने कहा हमने दो माह में बुदेल खंड की 550 किलोमीटर की पदयात्रा पुरी की। लेकिन हमें इतनी विशाल प्रतिमाऐ एक साथ कहीं दर्शन को नहीं मिली। जिस जिनालय में जाते हैं, वहीं मन रुक जाता है।हर मन्दिर में इतने विशाल भगवान कैसे स्थापित हुए होंगे? विचार कर मन आनंद से भर जाता है। हमने कौन सा पुण्य किया की इतनी विशाल प्रतिमाओं के दर्शन मिल रहें हैं ये सभी को विचार करना है।
संकलित अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमंडी

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