आज के युवाओं में शील संयम और सदाचार के प्रति भटकाव आया है- मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज
भोपाल (अवधपुरी)
“अकेले योन संयम को साध लेना ही ब्रह्मचर्य नहीं,अपनी आत्मा के निकट आकर अपनी साधना को पूर्ण करने का नाम ब्रह्मचर्य है”* उपरोक्त उदगार मुनिश्रैष्ठ प्रमाण सागर महाराज ने दशलक्षण वृत के अंतिम दिवस उत्तमब्रह्मचर्य धर्म के दिन प्रातःकालीन सभा में व्यक्त किये।
प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया श्रावक संस्कार शिविर के अंतिम दिवस प्रवचन के उपरांत सभी शिवारार्थियो के साथ चैनल पर सुन रहे सभी समाज बंधुओ से योन सदाचार वृत पालन करने एवं *सभी युवक युवतियों को विवाहेत्तर संबंध का पूर्ण रुपेण त्याग करने का संकल्प दिलाते हुये गर्भपात जैसा कुकृत्य न करने का संकल्प दिलाया,


उन्होंने कहा कि *वर्तमान समय में रिलेशनशिप के कारण आज के युवा शील और संयम को अर्थ हीन समझने लगे है* उसके कारण उन्मुक्त योनाचार को बढ़ावा मिला है,जिसके परिणाम बहूत ही विक्रतऔर वीभत्स आ रहे है यह बहुत चिंता का विषय है,इस तरह कि व्यवस्थाओं ने हमारी पुरी सामाजिक परंपरा निष्ठा को छिन्न भिन्न कर दिया है इसके कु परिणाम से युवक युवतियों में शील, संयम, और सदाचार के प्रति भटकाव आया है जो कतई स्वीकार योग्य नहीं है।
उन्होंने उन्मुक्त योनाचार की वकालत करने वालों को आड़े हाथ लेते हुये कहा कि उन्मुक्त योनाचार के कारण विवाह संबंध लेट हो रहे तथा जो हो रहे वह भी डिवोर्स के कगार पर है आजकल पति पत्नि के संबंध कपड़े की तरह हो गये है एक से छूटा दूसरे से कर लो जब चाहे बदल लो? उन्होंने कहा कि यह हमारी संस्कृति नहीं *भारतीय संस्कृति में दो ही बातें है या तो विवाह करो या वैराग्य की ओर चलो* उन्होंने कहा कि आज के युवक और युवतियों में एन्जॉय के कारण कैरेक्टर में कमी आई है जो धार्मिक प्रवत्ती के है उनका उपहास उड़ाया जाता है? उन्होंने कहा कि कहा जा रही है हमारी संस्कृति? इस पर ब्रेक लगना चाहिये और यह ब्रेक “सदगुरुओं की शरण में उनको जीवन की मर्यादा का पाठ पढ़कर ही लाया जा सकता है”
मुनि श्री ने चार शव्द *भ्रम, ब्रह्म,कर्म* की गहराई में उतरते हुये कहा कि चर्म पर दृष्टि रखना ही हमारा भ्रम है,जो आत्मा के जितना निकट है,वह ही उतना बड़ा ब्रह्मचारी है,आत्मा के निकट और आत्मा से दूरी ही ब्रह्म और भ्रम है, मुनि श्री ने कहा आत्मा से दूरी बनाने में सबसे बड़ा योगदान उस छोटी सी डिबिया (मोवाईल) का है,जो आपकी जेब में है उस छोटी सी डिबिया में ही आपका सारा संसार सिमट गया है,और वही छोटी सी डिबिया आज की युवा पीढ़ी को काम,भोग की लालसा में उलझाकर आत्मा से दूर कर रही है।
मुनि श्री ने कहा कि जिन्होंनेअपने काम,भोग और लालसा पर नियंत्रण किया उनकी वृति तथा प्रवत्ती में लगाम लगी है, उन्होंने अंतरमुखी होकर शील संयम और सदाचार का पालन किया है, उन्होंने कहा अंतरमुखी होंने के लिये सबसे पहले अपनी आत्मा को जानना जरुरी है? मैं कौन हुं,मेरा स्वरूप क्या है?मेरा गुणधर्म क्या है?मेरा स्वभाव क्या है? मुनि श्री ने कहा कि आत्मज्ञान ही हमारे जीवन के उत्कर्ष का आधार है,आत्मा को जाने बिना कभी भी कल्याण नहीं हो सकता जिसको एक बार आत्मज्ञान हो जाता है,उसकी प्रवत्ती में स्वाभाविक सहजता आ जाती है,उसका भ्रम टूटता है, ब्रह्म के बोध से मर्म का निवारण होता है,भ्रम टूटने से मर्म की उपलब्धि कर्म का निवारण होता है आचार्य कुंद कुंद कहते है आध्यात्मिक साधना का आधार अपने आपको जानना और पहचानना है कि मैं हुं कौन? जिस दिन तुम जीवन की सच्चाई को जान लोगे तेरा सारा व्यामोह दूर होकर जीवन की दशा और दिशा बदल जाएगी,उन्होंने कहा कि क्षण मात्र के सुख के पीछे अपने संपूर्ण जीवन और अपनी संपूर्ण शक्ती को इस “काम भोग” की लालसा में खपा दिया अब भी संभल जाओ? यह शरीर की खाज खुजाने के समान है उसको खुजलाने में सुख नहीं उस पर मलहम लगाने में ही सार है,उसी प्रकार जिसको आत्मज्ञान हो जाता है,वह काम भोग की खुजली को खुजलाता नहीं उस खाज पर तत्वज्ञान की मलहम लगाकर उसे स्थाई रुप से ठीक करता है
उन्होंने आयोध्या प्रसाद गोहिल की रचना में ब्रहमचारणी गायका उदाहरण देते हुये कहा कि संयम अकेले मनुष्य में ही नहीं होता यह पशु में भी घट जाता है,एक परिवार में एक गाय पलती थी उसने पांच सात बच्चों को जन्म दे दिया,उसके उपरांत उसे जब गर्भवती बनाने की अनेक चेष्टा की गई तो उस गाय ने घर की बिटिया को स्वपन दिया कि अब मेंने बृहमचर्य व्रत अपना लिया है अतःअब मुझे गर्भवती बनाने का प्रयास किया तो में कुए में कूदकर अपनी जान दे दूंगी घर के लोगों ने महज इसे सपना समझा और उस गाय को एक साड़ से संपर्क कराया तो उस गाय ने अपने आपको रस्सी से छुड़ाकर सामने कुये में छलांग लगा अपनी जान दे दी।
उपरोक्त जानकारी देते हुये प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया भगवान वासूपूज्य स्वामी का निर्वाण महोत्सव मनाते हुये निर्वाणलाड़ू चढ़ाया गया एवं अनंतनाथ भगवान की पूजन की गई अनेक शिवारार्थियो ने उपवास रखा तथा दौपहर में विद्याप्रमाण गुरूकुलम से जलयात्रा निकाली गई जो कि संविद नगर जैन मंदिर से होती हुई वापिस गुरुकुल प्रागंण में आई तथा भगवान का अभिषेक संपन्न हुआ एवं श्री जी जिनालय में विराजमान किये गये। रविवार को पूर्णिमा के अवसर पर 55 मिनट की वृहद शांतिधारा एवं सभी तपस्वियो का पारणा एवं सम्मान समारोह रखा गया है। मुनि श्री के सानिध्य में 14 सितंबर को संपूर्ण भोपाल की जैन समाज का क्षमावाणी पर्व मनाया जाएगा।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

