वास्तविकता की पहचान होते ही जीव सिद्धत्व को प्राप्त कर लेता है विमल सागर महाराज
शाहगढ़
पूज्य मुनि श्री विमल सागर महाराज सानिध्य मे तीन दिवसीय महोत्सव शुरू हूआ व निकाली घटयात्रा निकाली गई। इस अवसर पर पूज्य मुनि श्री ने उद्बोधन मे कहा वास्तविकता की पहचान होते ही जीव सिद्धत्व को प्राप्त कर लेता है लेकिन पहले हमें अपनी वास्तविकता को पहचानना होगा उन्होने जीरामन का उदाहरण दिया बताया जिस प्रकार जीरामन में बहुत चीजों का मिश्रण है लेकिन नाम जीरामन जबकि जीरामन में जीरे की मात्रा अल्प होती है।
नगर के सिंघई जिनालय में चल रहे नवीन वेदी प्रतिष्ठा महोत्सव के पहले दिन बुधवार को मुनिश्री विमलसागर महाराज ने धर्मसभा में कही। उन्होंने कहा कि तीन दिवसीय कार्यक्रम से हम देवाधिदेव मूलनायक पारसनाथ भगवान को उच्चासन देने जा रहे हैं। कहा गया है कि तीन लोक के नाथ को उच्चासन देने वाला भी सदुपयोग से सिद्धत्व को प्राप्त करता है। मुनिश्री ने कहा कि वस्तु के स्वरूप को समझने के लिए उसके स्वभाव को जानना जरूरी है जिस प्रकार वेदिका पर भगवान विराजमान है उन्हें पहचानने के लिए चिह्न और उनके नाम का अनुसरण करना पड़ता है। हम यहां के मूलनायक भगवान पारसनाथ को लेलें। उन्हें पहचानने के लिए सर्प चिह्न को देखकर उनकी पहचान करते हैं। ठीक ऐसे ही अपने वास्तविक स्वरूप की पहचान होते ही देर नहीं होगी अपने सिद्ध बनने में।
मुनिश्री ने कहा कि वर्तमान में अपना नाम गोत्र पद से पहचान बता रहे हैं इसलिए अपनी पहचान नहीं कर पा रहे बहीरंग कि नहीं अपने अंतर्मन का चिंतन करो, जिस प्रकार धनी धन नहीं बनाता जिसके पास धन होता है वही धनी बनता है ठीक ऐसे ही संसार में रहने वाला प्राणी परिवर्तन करता रहता है। मन वचन काय तीन उपयोग हैं इन उपयोगों को अच्छे से उपयोग करने वाला ही सदुपयोग बनता है और वही सिद्धत्व को प्राप्त करता है।
दैनिक भास्कर का साभार
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
