त्याग के बिना उपलब्धि नहीं हो सकती आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज 

धर्म

त्याग के बिना उपलब्धि नहीं हो सकती आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज 

रामगंजमंडी 

परम पूज्य आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज सानिध्य में दसलक्षण पर्व के आठवें दिवस को उत्तम त्याग धर्म के रूप में मनाया एवम उत्तम त्याग धर्म की आराधना की गई।

      आचार्य श्री ने त्याग के विषय में बताते हुए कहा कि डर सबको लगता है त्याग से लेकिन जब भी उपलब्धि होगी वो त्याग से ही होगी बिना त्याग के उपलब्धि नहीं हो सकती।

 

 

उन्होंने कहा फैक्ट्री नहीं जाएं दुकान पर नहीं जाएं तो धन का अर्जन होगा क्या नहीं होगा घर को तो छोड़ना ही होगा। हम कहीं भी दृष्टि डालें तो त्याग तो करना ही पड़ता है। 

 

    

 

उत्तम त्याग के विषय में कहा कि आत्म हित के प्रयोजन के लिए त्याग करना उत्तम त्याग कहलाता है लौकिक कार्यों के लिए नहीं आत्म हित के लिए त्याग करना बहुत से लोग क्या करते है मेरा यह काम नहीं होगा तब तक मेरा यह त्याग है ऐसा त्याग आत्म हित के लिए नहीं होता। ऐसा त्याग लौकिक हित के लिए होता है। हमें आत्महित करना चाहिए।

 

     त्याग में आत्मविश्वास चाहिए

आचार्य श्री ने कहा छोटी से वस्तु छोटी त्याग करेंगे तो आपको बहुत बड़ा आत्मविश्वास चाहिए क्योंकि धर्म परीक्षा करता है क्या मालूम आज त्याग कर दो डॉक्टर वैद्य कह दे यह खाओगे तो जिंदा रहोगे। क्योंकि त्याग होता तो परीक्षा भी होती है इसीलिए त्याग में आत्मविश्वास बहुत चाहिए बिना श्रद्धा बिना आत्मविश्वास के त्याग हो ही नहीं सकता।

          

भूखे रहना उपवास नहीं

   उपवास की परिभाषा को बताते हुए आचार्य श्री ने कहा भूखे रहना उपवास नहीं है उप वास का अर्थ बताते हुए आचार्य श्री ने कहा कि उप का अर्थ है आत्मा वास का मतलब है वास का अर्थ है आत्मा में रहना आत्मा के प्रयोजन से चारों प्रकार के आहार का त्याग करना उपवास है शरीर कैसा भी हो यदि भोजन नहीं करेंगे तो शरीर तो मुरझाएगा शरीर के सामने हम जीत नहीं सकते लेकिन हम आत्मा के सामने खड़े हो जाएं तो शरीर को जीत सकते हैं। उपवास के अंदर शरीर के संतुलन बनाने को नहीं कहा गया है आत्मा के संतुलन को बनाने को कहा गया है। अगर आत्मा में हमारा संतुलन है आत्मा में हमारा उपयोग है और हमने आत्म हित के लिए चारों प्रकार के आहार का त्याग किया है तो इसका मतलब यह है कि आपका उपवास सही है। छोड़ने और नहीं खाना उपवास नहीं होता। मन मस्तिष्क में आत्महित होना चाहिए। त्याग में दृढ़ता होनी चाहिए जितनी ज्यादा होती है उतना ज्यादा उपवास का फल बढ़ता जाता है। महाराज श्री ने कहा कि शास्त्रों में लिखा है कि यदि मुनिराज अनासक्त भाव से आहार करते हैं तो वह भी उनका उपवास हे। भोजन के प्रति आसक्ति नहीं होना चाहिए।

 

  

 त्याग दूसरो को संतुष्ट करने के लिए नहीं होता है त्याग का मतलब आत्म हित होता है दूसरों को बताने के लिए दूसरों को संतुष्ट करने के लिए त्याग नहीं किया जाता

   

        जो चीज जैन धर्म खाने निषेध करता है आयुर्वेद भी उसे हानिकारक मानता है  आचार्य श्री ने कहा कि आयुर्वेद चिकित्सा में तो यह लिखा है जो त्याग खाने के लिए जैन धर्म निषेध करता है उसे भी आयुर्वेद स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मानता है। और यह शरीर के लाभप्रद थी ही नहीं।

   

     गृहस्थ संकल्पी हिंसा का त्याग कर सकता है 

   त्याग की भूमिका में गुरुदेव ने कहा कि गृहस्थ हिंसा का त्याग कर सकता है और हिंसा में भी संकल्प भी हिंसा का त्याग कर सकता है इसका मतलब है कि मैं संकल्प लेकर किसी को नहीं मारूंगा। जैनी कभी भी संकल्प लेकर योजना बनाकर किसी को नहीं मारेगा वह सोच ही नहीं सकता। झूठ का त्याग भी किया जा सकता लेकिन ऐसा सत्य भी नहीं बोलना जिससे दूसरों के प्राण चले जाए। छोटे छोटे सत्य किसी के प्राणों का एवम स्वयं के प्राणों के घात का कारण न बने ऐसा सत्य गृहस्थ अवस्था में बोलते रहना।

     

 

प्राणी मात्र के प्रति मैत्री भाव अभयदान है 

  आचार्य श्री ने चार प्रकार के दान का वर्णन करते हुए दान का महत्व बताया उन्होंने अभयदान के विषय में कहा कि प्राणी मात्र के प्रति मैत्री भाव अभयदान है। ये फ़िक्र मन मस्तिष्क में बने रहना मेरे द्वारा किसी जीव की 

विराधना ना हो जाए यह अभय दान है। सावधान रहना सावधानी से चलना सावधानी से काम करना विवेक पूर्वक कार्य की सिद्धि करना ये फ़िक्र बनी रहना मेरे द्वारा किसी जीव की हिंसा ना हो। अभय दान से अहिंसा का पालन होता है। 

 

 

महाराज श्री ने अंत में कहा कि उत्तम त्याग धर्म यह कहता है कि आज कुछ ना कुछ एक त्याग जरूर करना वस्तु से नहीं वस्तु की अनासक्ति का त्याग करो। उन्होंने गुरुदेव विराग सागर महाराज से जुड़ा अपना संस्मरण सुनाते हुए कहा कि गुरुदेव हमसे कहा करते थे कि आहार में गए यदि रसगुल्ला सामने आए तो छोड़ना मत थोड़ी सा लेना लेकिन फिर वह जिव्हा पर जाए मीठी स्वादिष्ट लगे अब उसका त्याग करो। मन यह कहने लगे अब खाओ तो तुरंत उसका त्याग करो। तुरंत छोड़ दो वस्तु छोड़ दी और उससे आसक्ति बनी रही तो उसको त्याग करने का कोई मतलब नहीं धीरे-धीरे त्याग का भाव करो और अंत में ऐसा भी अवसर मिलेगा की आप सब कुछ त्याग करके देह परिवर्तन करेंगे। 

   अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

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