त्याग धर्म में राजा श्रेयांस ने सबसे पहले दानतीर्थ का प्रवर्तन कियाआचार्य श्री वर्धमान सागर जी
टोंक 10 लक्षण धर्म में पहले दिन से चार कषायों का त्याग करने की शिक्षा उपदेश दिया गया शास्त्रों में पूजन में उल्लेख है कि दान चार प्रकार का चार संघ को दीजिए ।त्यागधर्म चार प्रकार के दान आहार,ज्ञान,अभय और शास्त्रदान से होता हैं। साधु को आहारदान देने में चारों दान समाहित हैं। दान हमेशा उत्तम पात्र को संयम उपकरण पीछी कमंडल शास्त्र और आहारदान, औषधिदान देना चाहिए। श्रावक को हमेशा साधु के लिए शुद्ध भोजन बनाकर साधु के लिए द्वार प्रेक्षण करना चाहिए इस निमित आप भी शुद्ध भोजन करते हैं यदि साधु का आहार नहीं होता हैं तो भी द्वार प्रेक्षण करने से पुण्य की प्राप्ति होती हैं। जिस प्रकार छोटे बीज एक दिन बड़ा वृक्ष बन जाता है ,उसी प्रकार छोटे-छोटे त्याग करने से भी एक दिन आप भी आत्मा से परमात्मा बन सकते हैं। त्याग चेतन और अचेतन द्रव्य का किया जाता है जिन्होंने चेतन द्रव्य का त्याग किया वह आज साधु बनकर ऊपर मंच पर बैठे हैं यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने उत्तम त्याग धर्म के दिन धर्म सभा में प्रकट की। राजेश पंचोलिया के अनुसार आचार्य श्री ने आगे बताया कि प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ भगवान ने 6 माह तप ध्यान किया , उसके बाद अगले 6 माह तक उन्हें आहार नहीं मिला तब राजा श्रेयांश को पूर्व जन्म में आहार देने का जातिस्मरण से भगवान आदिनाथ को सर्वप्रथम आहार दान देकर दान तीर्थ का प्रवर्तन किया। इस 20वीं सदी में भी प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज को क्षुल्लक अवस्था में भी चार दिनों तक उचित विधि से पड़गाहन नहीं करने के कारण आहार नहीं हुआ था। द्रव्य के त्याग से आप इंद्रध्वज मंडल विधान की पूजन कर पुण्य ओर आनंद की अनुभूति कर रहे हो।आचार्य श्री ने आर्यिका श्री ज्ञानमति जी के शीघ्र स्वस्थ होने की मंगल भावना की । आचार्य श्री ने बताया कि राजा श्री वेग ने दो चारण रिद्धिधारी मुनि अर्ककीर्ति और अमितकीर्ति को आहारदान देने के बाद भगवान शांतिनाथ हुए ,इसी प्रकार श्रीकृष्ण ने भी मुनिराज को औषधीदान देकर तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया ।औषधी दान से साधु के संयम ,व्रत, ध्यान तप की रक्षा होती है ।त्याग से राग द्वेष परिग्रह कम होता हैं त्याग से यश बढ़ता है, त्याग से सद गति मिलती है, त्याग से आनंद होता हैं श्रावक श्राविकाओं के 6 आवश्यक कार्यों में पूजा और दान प्रमुख हैं। अंगदान शास्त्र अनुसार ठीक नहीं है आपके अंग का दुरुपयोग व्यसन या हिंसा में हो सकता हैं आचार्य श्री ने एक महत्वपूर्ण सूत्र बताया कि आत्म स्वभाव ,निज पद को परिग्रह त्याग कर प्राप्त कर सकते हैं । देश विश्व यदि इन दश धर्मों को अपनाता हैं तो सुख और शांति हो सकती हैं।अनेक कथा और उदाहरण से बताया कि त्याग और दान में अनेक प्रसिद्ध हुए हैं एक ग्वाला मुनिराज को शास्त्र देने से अगले जन्म में कुंदकुंद आचार्य हुए।आज त्याग धर्म का दिन टोंक में स्मरणीय हो गया जब अनेक भक्तों ने चंचला लक्ष्मी का आहार दान में राशि देकर साधु का चौका लगाने के लिए संकल्पित हुए।
राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
