“ऊंची सोच” से ही मनुष्य उन्नति करता है”- मुनि श्री प्रमाणसागर
भोपाल (अवधपुरी)“निस्वार्थ भाव से दिया गया दान सच्चा और प्रभावी होता है,जिससे दान दाता को व्यक्तिगत संतुष्टि मिलती है, उदारता और करुणा का विकास होता है” तथा अहंकार का विनाश होता है” उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने उत्तम त्याग धर्म पर व्यक्त किये। मुनि श्री ने कहा किदान देय मन हर्ष विशेषे,इह भव पर भव सुख दीसे,
अच्छे पुण्य के संयोग रोज रोज नहीं मिलते जब भी ऐसा अवसर मिले तो कभी अपना मन ओछा मत करना कुछ नहीं तो जो है उसी में से अपना अंशदान अवश्य करना “धन का सदव्यय करने की समझ जिसके पास होती है उसके हाथ हमेशा दान देने के लिये ही ऊपर उठते है”पुण्य ही जीवन की प्रगति का आधार है भगवान से प्रार्थना करो कि मेरे हाथों से रोजाना दान निकलना चाहिये,”बड़ी सोच ही जीवन को सार्थक बनाती है,ओछी सोच हमेशा पश्चाताप कराती है”


मुनि श्री ने रविन्द्रनाथ टैगोर की एक कहानी सुनाते हुये कहा कि भिखारी भीख मांगने के लिये अपनी झोली में कुछ चावल के दाने लेकर निकला सामने से राजा का रथ आता देख उसने सोचा कि आज तो भीख अच्छी मिलेगी वह झोली फैलाने के भाव से आगे बड़ा उधर राजा अपने रथ से नीचे उतरा और उसने भिखारी के सामने अपनी झोली फैला दी ओर कहा कि राज्य पर आर्थिक संकट है,ज्योतिष के अनुसार जिस पर सबसे पहली नजर पड़े उसके सामने झोली पसारना ओर वह जो भी दे उसे लेकर आना उससे तुम्हारे राज्य का कोष बढ़ जाएगा।
राजा ने विनम्रता से उस भिखारी से कहा जो कुछ भी तुम्हारे पास है उसे दे दो भिखारी बहूत सकुचाया और उसने अपनी झोली से एक दाना चावल निकाला और उसकी झोली में डाल दिया, लेकिन मन में भारीपन था कि राजा ने उससे गांठ का एक दाना और ले लिया हालांकि उसे उस दिन बहुत भिक्षा मिली भारी मन से घर आया,पत्नी ने उसकी झोली उड़ेली तो उसमें एक दाना सोने का चमक रहा था उसने अपना माथा पकड़ लिया अरे मेंने यह क्या कर दिया राजा को यदि पूरी झोली उड़ेल देता तो आज पूरी झोली सोने की होती”

मुनि श्री ने कहा कि देखा दान का प्रभाव इसीलिये कहा गया है कि जब भी कोई दान मांगने तुम्हारे द्वार पर आये तो उसे खाली हाथ मत लौटाना उसको अंश दान अवश्य करना”देने का भाव बनाये रखोगे तो जीवन का रास्ता अवश्य प्रशस्त होगा मुनि श्री ने कहा कि”दान हमेशा अंश का ही होता है, सर्वस का दान और संपूर्ण धन का त्याग कभी मत करना हमेशा अपने लिये बचा कर रखना। दान अंश का होता है तथा त्याग सर्वस्व का होता है।
मुनि श्री ने कहा कि गरीबी की दशा में दान देने से पुण्य और बढ़ता है उन्होंने चार वाक्य पाना, खोना, देना, सोना, की चर्चा को आगे बढ़ाते हुये कहा कि मान लीजिये यदि आप पेट में भोजन डालते जाओ और मल विसर्जन न हो तो क्या होगा? बैचैनी होगी उसी प्रकार आप अपनी कमाई को करते रहोगे और उसे यदि अच्छे कार्यों में नहीं लगाओगे तो वह व्यसन एवं , बीमारी,कोर्ट कचहरी आदि में आपका धन जाएगा।
इसलिये कहा गया है कि पाना खोना देना और सोनाअच्छे कार्यों मेंं दोगे तो आपका जीवन सोने के समान चमकेगा।इस अवसर पर मुनि श्री संघान सागर महाराज एवं क्षुल्लक गण मंचासीन थे
उपरोक्त जानकारी प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया त्याग धर्म के दिवस पर कई श्रद्धालुओं ने जीवदया के निमित्त से अपने दान की घोषणा की वही विद्याप्रमाण गुरुकुलम् की योजनाओं में अपने दान की स्वीकृति प्रदान की। कार्यक्रम का संचालन अशोक भैया जी ने किया।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312


