क्रोध करना बुरा नहीं है क्रोध को मन में रख लेना बुरा है प्रसन्न सागर महाराज
दिल्ली
अन्तर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय 105 पियूष सागरजी महाराज ससंघ तरुणसागरम तीर्थ पर वर्षायोग हेतु विराजमान हैं उनके सानिध्य में आज से दसलक्षण महापर्व उत्साह के साथ मनाया जा रहा है उसी श्रुंखला में उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने कहा पर्वो के पर्वराज का प्रथम चरण — उत्तम क्षमा उत्तम क्षमा की जिन्दगी जीने के लिये, कभी कभी – अपमान, उपेक्षा और कषाय की झाड़ झंझटो से भी जूझना पड़ता है। इसलिए —क्रोध करने के लिये रवि पुष्य योग सर्व श्रेष्ठ है.. और क्षमा के लिये बारह महिने चौबीस घन्टे..!अमृत चौघड़िया उपलब्ध है।
रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में अक्सर हम और आप देखते हैं कि — क्रोध करते हैं और फिर अफसोस करते हैं कि मुझे क्रोध नहीं करना था, क्यों कर दिया-? जरा सा निमित्त मिलता है और हम बेकाबू हो जाते हैं, फिर पश्चाताप करने लगते हैं, यह क्रम जीवन भर चलता है। पश्चाताप नहीं अब प्रायश्चित करना है। क्रोध के परिणामों पर विचार करना है। अन्यथा एक क्रोध — आदमी को ………… बना देता है।
क्रोध करना बुरा नहीं है, क्रोध को मन में रख लेना बुरा है, बैर की गाँठ बांध लेना बुरा है। क्रोध में बदले का भाव ही हमें भव भव भटकने को मजबूर कर देता है। कमठ – बदले के भाव के कारण से आज तक भटक रहा है और अनन्त दुःख भोग रहा है। इसलिए क्रोध को दबाने की नहीं – देखने और जानने की आवश्यकता है। क्रोध को दबाना ही खतरनाक है, कब तक क्रोध को दबा कर रखोगे-? एक दिन तो गुबार निकलेगा – क्योंकि दमन और वमन दोनों खतरनाक है।
इसलिए जो अपने क्रोध के दुष्प्रभाव को जान लेता है, वही उत्तम क्षमा को धारण कर पाता है। क्रोध, कर्म, कर्ज और रोग को जड़ से मिटाना ही उत्तम क्षमा धर्म है…!!!
