ऐसे धन का संचय करो जो आगे तुम्हारे साथ चला जाए विनिश्चय सागर महाराज 

धर्म

ऐसे धन का संचय करो जो आगे तुम्हारे साथ चला जाए विनिश्चय सागर महाराज 

रामगंजमंडी 

आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए धन और धर्म के विषय में बताया उन्होंने कहा धन से गृहस्थी चलती है धन से तिजोरी भरती है। प्रॉपर्टी खरीदकर डाली जाती है। इसी के साथ इंद्रिय विषय भी सरलता से प्राप्त हो जाते हैं। धर्म के विषय में बताते हुए कहा धर्म वह होता है जिससे आत्मीय शांति प्राप्त होती हैं सुकुन मिलता है आनंद आता है। धर्म होने पर ऐसा लगता है कि दुनिया का सब कुछ मुझे मिल गया है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में गुरुदेव ने कहा हम जिस दौड़ में दौड़ रहे हैं उस दौड़ में धर्म का महत्व नहीं है। धन का महत्व है। जब दिल और दिमाग में धन बैठा होता है तो धर्म की और उपयोग नहीं जाता। लोगो की सोच है धन है तो संतुष्टि है। अब तो लोगों का सोच में बन गया है धन हे तो धर्म है। 

 

 

 

  उन्होंने कहा ऐसे धन का संचय करो जो आगे भी तुम्हारे साथ चला जाए इस पर्याय के साथ आने वाली अगली पर्याय तक तुम्हारे साथ ही बना रहे ऐसे धन का संचय करो। ऐसा संचय सिर्फ धर्म हो सकता है। धर्म रूपी धन आगे तक तुम्हारे साथ रहेगा। धन रूपी धन इस पर्याय के बाद तुम्हारे साथ नहीं जाएगा। इसीलिए ऐसे धन का संचय करो जो आगे तक तुम्हारे साथ जा सके।

 

    देह विसर्जन की प्रथा बहुत बड़ी शिक्षा है 

   आचार्य श्री ने कहा यह जो देह विसर्जन की प्रथा चालू हुई है यह बहुत बड़ी शिक्षा है। हमें जरूर देखनी चाहिए। उस व्यक्ति को देखो जो हाय हाय में लगा था धन संग्रह में लगा था पाप में लगा था इंद्रिय विषय में लगा था परिवार के राग द्वेष मोह में लगा था और आज उस व्यक्ति देखो अचेत पड़ा है न कुछ बोल रहा है, न कुछ खा रहा है न पी रहा है आज शांत है। उन्होंने कहा जीवन में दो ही चक्र है मोह का चक्र और धर्म का चक्र रावण का उदाहरण देते हुए महाराज श्री ने कहा कि रावण लंका से निकला था युद्ध करने के लिए सुर्पणखा को हानि पहुंचाने वाले लोगों से युद्ध करने के लिए। लेकिन जैसे ही सीता पर दृष्टि पड़ी मोह के चक्र ने रावण को घेर लिया द्रव्य पर्याय गुणों को जानने वाला व्यक्ति भी मोह चक्र में फस गया। मोह का चक्र स्थान नहीं देखता परिस्थिति नहीं देखता कुछ का कुछ करने को तैयार हो जाता है। यह पर्व इसलिए आते हैं कि हम मोह चक्र से बाहर हो जाए पर्व धर्म चक्र में आने का अभ्यास है और और प्रयास है। जो धर्मचक्र में आता है उसके राग द्वेष मोह कम होते ही होते हैं। हमे प्रयास करना चाहिए की हम मोह चक्र से हटकर धर्म ध्यान में प्रवेश करें। न्याय से कमाओ और खर्च करो और परिवार की पूर्ति करो। उन्होंने कहा समझने की कोशिश करो और अगर समझने की कोशिश नहीं करोगे तो कभी समझ में नहीं आएगा।

 

कमंडल अर्थव्यवस्था का बहुत अच्छा सूचक है

  आचार्य श्री ने परिवार के अर्थव्यवस्था के लिए कमंडल का उदाहरण देते हुए कहा कि परिवार का बजट कमंडल की तरह बनाएं। कमंडल अर्थव्यवस्था के लिए बहुत अच्छा सूचक है। कमंडल को देखकर यदि अपने परिवार की अर्थव्यवस्था को बनाए बजट बनाए तो राज्य और देश की अर्थव्यवस्था बनाए तो बहुत अच्छी व्यवस्था बन सकती है। कमंडल की विशेषता बताते हुए गुरुदेव ने कहा कि कमंडल में दो स्थान होते हैं एक पानी को भरने का और एक पानी को निकालने का पानी को भरने का स्थान बड़ा होता है और निकलने का स्थान छोटा होता है। इसका उदाहरण देते हुए कहा कि संग्रह अधिक हो जाए लेकिन इंद्रियों के विषय में निकले कम संग्रह अधिक हो जाए लेकिन निकले कम ताकि आप मंदिर बना सके मूर्ति बना सके शास्त्र छपा देव शास्त्र गुरु की सेवा कर सके।

यह अर्थव्यवस्था आपके लिए लोक कल्याण के साथ आध्यात्म और आत्म कल्याण की और भी ले जाएगी।

 

 आचार्य श्री के प्रवचन से पूर्व मुनि श्री 108 प्रांजल सागर महाराज ने पर्व का विशेष महत्व बताते हुए ध्यान करने पर जोर दिया और कहा कि ध्यान करने से बहुत शक्ति मिलती है।

 

    अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

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