पदयात्री से करपात्री बनने की ओर यात्रा हो तो पद यात्रा की सार्थकता है सुधासागर महाराज 

धर्म

पदयात्री से करपात्री बनने की ओर यात्रा हो तो पद यात्रा की सार्थकता है सुधासागर महाराज 

अशोक नगर–निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव 108 सुधासागर महाराज सांगली महाराष्ट्र से पदयात्रा करते हुए आयें है कल करपात्री बनेंगे दो चीजों के प्रति विचार करें जो मोक्ष चले गए उन मोक्ष जाने वालो के प्रति श्रद्धा है पदयात्री से करपात्री बनने की ओर यात्रा हो तो पद यात्रा की सार्थकता है अगला कदम करपात्रीपदयात्री से करपात्री बनने की ओर यात्रा हो तो पद यात्रा की सार्थकता है सुधासागर महाराज  का होना चाहिए जो भगवान बन गये उनके लिए तुम क्या कर सकते हो क्या किया भगवान बनने गये उसे पहले भगवान को नमस्कार करना होगा पहले भक्त बने भक्त बनकर ही भगवान बन पाओगे भगवान को देखकर ऐसा लगता है कि उहो भाग्य मेरो उदय आयो भगवान के लिए में कुछ भी कर सकता हूं अपने प्राण भी दे सकता हूं कोई भी संकट उठा सकता हूं ऐसा परिणाम तुम्हारे अंदर आया बस तुम्हारा आइडेंटी कार्ड बन गया।

 

 

दूसरे बच्चो के प्रति प्रेम वात्सल्य ही तुम्हारे लिए टापर बनायेगा

उन्होंने कहा कि जैसे मैं हमेशा कहा करता हूं मेरी कक्षा के सारे बच्चे पास हों गये मैं तो फैल हो गया लेकिन सभी साथियों की खुशी में मिठाईयां बांट रहा हूं ये सिद्धांत है आपसे जो आगे निकल गए उनके प्रति जो प्रेम वात्सल्य स्नेह है वहीं तुझे क्लास में टोप पर ले जायेंगी ऐसे ही जो भगवान बन गये ये जो मुनि राज है ये तो भगवान से भी बड़े हैं जो हमें साक्षात मार्ग दिखा रहे हैं यहां तक कि कह दिया गया गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागूं पाय बलिहारी गुरु आपकी गोविंद दोऊ बताये एक तो छयालीस दोषों से रहित और एक निजी भगवान बना लिया जिस पद को इतना रिस्पेक्ट दे दिया कि मुनि राज को ही भगवान रुप मान लिया तो तुम्हारे लिए ऐसा कर्म बधेगा जो तुम्हें भगवान बना देगा एक तुमने ऐसा कर्म कर लिया कि मुनि राज को निकृष्ट शब्द बोल दिया तो ये कर्म तुम्हारे लिए कभी नहीं छोड़ेगा राजा श्रेणिक ने महाराज के गले में साप ही तो डाला था फिर क्या हुआ साक्षात प्रभु महावीर भी श्रेणिक राजा को नहीं बचा पाए।

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उन्होंने कहा कि आप ने किसी निमित्त से तीर्थ की वंदना की गुरु दर्शन यात्रा की पहले महाराज को विहार कराने माली जाता था मैंने देखा है जब समाज को अभिषेक और स्वयं सेवा करने की प्रेरणा दी तब हमने परिणाम देखें है मैंने कहा कि वंदे तदगुण लब्धये आचार्य महाराज के साथ देखा था सैकड़ों लोग साथ में विहार करते थे आज मुनि महाराज के साथ कमंडल लेकर साथ चलो कल तुम पिच्छिका लेकर विहार करोगे

 

 

पदयात्राएं तो बहुत हुई गुरु तीर्थ वंदना कठिन है–प्रदीप भ इया*

कर्नाटक महाराष्ट्र बोर्डर से 1256 किलोमीटर की पदयात्रा कर परमोदय तीर्थ कवठे पिरान सांगली से अशोक नगर में विराजमान तीर्थ चक्रवर्ती मुनि पुंगव श्रीसुधासागरजी महारराज गुरु तीर्थ वंदना कर श्री फल भेंट करने पहुंचे जो विशाल जन समूह ने खड़े होकर पद यात्रियों का तालियों की गड़गड़ाहट से अभिनंदन किया इस दौरान प्रतिष्ठाचार्य प्रदीप भइया ने कहा कि एक छोटे से गांव कवठे पिरान के कृषक परिवार ने पाषाण के मन्दिर का निर्माण करने का संकल्प लिया और उस संकल्प की पूर्ति के लिए आज छत्तीस दिन पूर्व पैदल गुरु तीर्थ वंदना के लिए निकल पड़े साढ़े बारह सौ किलोमीटर से भी अधिक की असंभव सी लग रही इस पैदल यात्रा को पैंतीस दिनों पूरा कर आज गुरु कृपा पाने उपस्थित हुए हम कहेंगे ऐतिहासिक विश्व शांति पद पात्रा के समापन पर आप कुछ दिन यहां रूके।

 

 

 

इस दौरान जय कुमार कवठे ने कहा कि गुरु तीर्थ वंदना पद यात्रा तो अभी एक मुकाम है असली उद्देश्य तो गुरु महाराज को दक्षिण भारत कर्नाटक महाराष्ट्र ले जाने की भावना है जिससे पाषाण शिला काल से निर्मित हो रहे की प्रतिष्ठा हो सके।

     संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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