जिसके जीवन में ईर्ष्या की आग जलती है,उसका जीवन छोटा ही नहीं,खोटा भी होता है”- मुनि श्री प्रमाणसागर  

धर्म

“जिसके जीवन में ईर्ष्या की आग जलती है,उसका जीवन छोटा ही नहीं,खोटा भी होता है”- मुनि श्री प्रमाणसागर  

भोपाल 

“स्वच्छता बाहर की नहीं, भीतर से भी होंना चाहिये” उपरोक्त विषय पर उदगार मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने अवधपुरी भोपाल में व्यक्त किये मुनि श्री ने कहा मनुष्य की चार दुर्बलताएं है क्रोध,ईर्ष्या, लोभ,अहंकार इस विषय पर प्रकाश डालते हुये कहा कि यह दुर्बलताएं बहूत खतरनाक है जहा क्रोध का आवेग हमारे सारे संबंधों को खत्म कर देता है,वही ईर्ष्या एक ऐसी आग है जो सबको भस्म कर देती है,यह ईर्ष्या चांहे व्यक्तियो परिवारों,समाज, समुदाय तथा साधु संतों के बीच भी हो सकती है।

 

 

 

मुनि श्री ने कहा कि “ईर्ष्या” हमारे परिवारिक सौहार्द को तो समाप्त करती ही है, वही अपने आपको भी छोटा कर देती है, उपरोक्त संदर्भ में पूज्यगुरुदेव ने एक हायकू लिखा है “ईर्ष्या क्यों करुं ईर्ष्या तो बड़ो से हो’ छोटा क्यू बनूं”? इसमें बहुत गहरी बात छिपी है, मुनि श्री ने कहा कि किसी को आगे बढ़ता हुआ देखकर उससे प्रेरणा लो,लेकिन हम देख रहे है कि वह अपनी ऊर्जा को अपनी लाईन को बड़ा करने की बजाय सामने वाले की लाईन को छोटा करने में खपा रहा है,यह एक नकारात्मकता है इससे बचना चाहिए।

उन्होंने उदाहरण देते हुये कहा कि जो लोग आज उपलब्धियो के मुकाम पर पहुंचे है वह किसी से ईर्ष्या और स्पर्धा के कारण आगे नहीं बड़े ये वह लोग है जिन्होंने अपने लक्ष्य पर खुद तदानुरूप पुरुषार्थ किया और आगे बढ़े उन्होंने कहा कि आजकल लोग ईर्ष्या के कारण कुछ भी करने पर आमादा हो जाते है,यह नहीं सोचते कि मेरा क्या होगा? दूसरों की बढ़ती को देखकर खाली पीले दुबले क्यों होते हो? उनकी बढ़ती को देखकर प्रेरणा पाओगे तो जीवन में सकारात्मकता आएगी यदि आलोचना कर रहे हो तो आप बहुत निचली भूमिका में जी रहे हो।

 

 

मुनि श्री ने कहा कि आप लोग घर परिवार में छोटा आगे बढ़ रहा है तो उसकी प्रशंसा करोगे तो देखना आपके घर में सकारात्मक परिवर्तन आ रहा है,हृदय में सदभाव होगा तो आप गुणों का आदर करोगे,और यदि मन छोटा होगा तो बड़ों और छोटों में सिर्फ खोट नजर आएगी खुद की खोट नजर नहीं आएगी,इस विकृति से अपने आपको बाहर निकालिये “ईर्ष्या मन का मैल है इसे धोना है” तीसरे क्रम पर लोभ की चर्चा करते हुये मुनि श्री ने कहा कि अपने मन के दर्पण में झांकिये इसमें आप पल पल में लोभ की गंदगी भर रहे है इसे साफ करने का उद्यम कीजिये हमारे जीवन का एक ही मकसद होंना चाहिये विकृति से विशुद्धि ,विकार से निर्विकार की ओर होंना चाहिये अंदर मैल भरा होगा तो जीवन विकृत होगा मन में सरलता कोमलता क्षमा और सहजता का भाव लायें जीवन आनंद से भर जाएगा।

 

मुनि श्री ने कहा कि यदि अपने जीवन को पवित्र बनाना चाहते हो तो इन विकृतियों से अपने आपको बचाइये दुनिया में अच्छे और बुरे दोनों तरह के लोग है आपका अपना स्थान क्या है इस बात को अवश्य जानने की कोशिश करना।

       अविनाश जैन विद्यावाणी से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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