वैराग्य व ध्यान से शांत होती हैं आत्मा की अशुद्धियां: निरामय सागर महाराज

धर्म

वैराग्य व ध्यान से शांत होती हैं आत्मा की अशुद्धियां: निरामय सागर महाराज

 गुना

चौधरी मोहल्ला स्थित महावीर भवन में विराजित मुनिश्री निरामय सागर महाराज ने अपने धर्मोपदेश में आत्मा की शुद्धि व मोक्ष मार्ग के गूढ़ रहस्यों को सरल उदाहरणों से समझाया मुनिश्री ने कहा कि दिगंबर मुनिराज समताधारी होते हैं और जितना वे समता भाव रखते हैं, उतना उनका आध्यात्मिक स्तर ऊंचा होता जाता है। उन्होंने बताया कि संचित कर्मों का आत्मा से एक देश अलग हो जाना ही निर्जरा कहलाता है।

 

 

दुकान के माध्यम से समझाया सात तत्वों का रहस्य

मुनिश्री निरामय सागर महाराज ने सात तत्वों की व्याख्या को अत्यंत सरल बना दिया। उन्होंने बताया कि जीव और अजीव के माध्यम से आत्मा और शरीर को समझा जा सकता है। आश्रव वह प्रक्रिया है जिससे कर्म आत्मा में प्रवेश करते हैं,जबकि संवर उन्हें रोकने की क्रिया है। बंध, कर्मों के आत्मा से जुड़ने की प्रक्रिया हैऔर निर्जरा उन्हें अलग करने की। मोक्ष तब होता है जब आत्मा सभी कर्मों से पूर्णतःमुक्त हो जाती है। यह दृष्टांत समाज जनों को गहराई से प्रभावित कर गया ।और मोक्ष को व्यावहारिक उदाहरण से स्पष्ट किया। उन्होंने कहा, “मान लीजिए कि एक दुकान अजीव है,उसका मालिक जीव है। उसमें माल आना आश्रव, जमाना बंध, खरीदारी रोकना संवर, माल धीरे-धीरे निकालना निर्जरा और पूरी तरह खाली हो जाना मोक्ष है।

 

मुनिश्री ने समझाया कि वैराग्य से युक्त और अहंकार से रहित साधक की ही कर्म निर्जरा होती है। उन्होंनेउपशम भाव, तप, धर्म ध्यान एवं शुक्ल ध्यान की महत्ता को बताते हुए कहा कि ये सब आत्मा के कल्याण के आवश्यक साधन हैं।

 

मुनिश्री ने कहा कि जैसे मटमैले पानी में फिटकरी डालने पर गंदगी नीचे बैठ जाती है, वैसे हीसाधना से आत्मा की अशुद्धियाँ शांत होती हैं।

      संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *