“चाहे कैसी भी विषम परिस्थिति हों,अपनी सोच को सकारात्मक रखो”- मुनि श्री प्रमाण सागर
भोपाल (अवधपुरी)
“जहा शिकायत होगी वहां दूरियां बढ़ेगी,और जहा आभार होगा वहा प्रेम बढ़ेगा और दूरियां घटेगी””जीवन में समस्या किसके पास नहीं है, लेकिन समस्या का समाधान शिकायत से नहीं,उसके समाधान के लिये रास्ता खोजना चाहिये और वह रास्ता बाहर से नहीं, आपको स्वं भीतर खोजना होगा” उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने प्रातःप्रवचन सभा में व्यक्त किये।
उन्होंने भगवान के मंदिर में दर्शन करने पहुंचे चार भक्तों का उदाहरण देते हुये कहा कि पहला व्यक्ति बहुत बड़ा सेठ था लेकिन उसे भगवान से बहुत बड़ी शिकायत थी की मैं तेरा इतना बड़ा भक्त हुं मेरे पास धन की कमी नही,लेकिन कोई पूछता नहीं,परिवार है,लेकिन शांति नहीं,शरीर है पर स्वास्थ नहीं, संबंध है पर सामंजस्य नहीं- आखिर तू मुझे शांति,शौहरत,और स्वास्थ्य क्यों नहीं देता?मेरे संबंधों को क्यों ठीक क्यों नहीं करता? मैं रोज रोज तेरे चरणों में आकर अपनी गुहार लगाता हुं, फिर भी तू मेरी सुनता क्यों नहीं? सेठ ने अपनी शिकायते भगवान के समक्ष रखी और चला गया उसके जाते ही एक अंधा व्यक्ती वहा आया,उसने सबसे पहले अहोभाव से भरकर भगवान को धन्यवाद दिया और आभार प्रकट करते हुये कहा हे प्रभु मैं आपका बहुत आभारी हु जो आपने मुझ पर इतनी कृपा की मै अपने सबल पैरों से चलकर यहा आ गया, हैं प्रभु में आपको देख नहीं सकता लेकिन श्रद्धा से आपको नमन करता हु, मुझे खुशी है कि कम से कम आपकी दृष्टि तो मुझ पर पड़ती है, और में यह जानकर निहाल हो जाता हुं।
इसके पश्चात एक सामान्य ग्रहस्थ पहुंचा और उसने भी भगवान से निवेदन किया हे भगवान मेरे रूके काम पूरे कर दो तथा अपने स्वस्थ रहने, संतान होंने, मुकदमे में जीत,और अपने सभी रुके काम को पूरा करने की कामना करते हुये चला गया,इसके पश्चात चौथा व्यक्ति पहुंचा जो एक युवा साधक था उसने पहुंचते ही प्रभु से चरणों में कोटि कोटि नमन किया और विनती की है प्रभु मुझे इतनी शक्ति दो कि मैं अपने जीवन में सभी प्रकार की चुनौतियों का सामना कर सकूं जीवन में जब कभी कोई उतार चढ़ाव आयें तो अपने मन को स्थिर रख सकूं,मेरे अंदर संघर्ष करने की क्षमता हो तथा मैं अपने सभी कार्य आपकी प्रेरणा से अपने दम पर पूरा कर सकूं मुझे किसी के सामने हाथ न जोडना पड़े।


मुनि श्री ने कहा कि चारों व्यक्ति ने अपने अपने तरीक़े से प्रार्थना की पहले व्यक्ति के मन में शिकायतें थी तो दूसरे के मन में आभार तीसरे के मन में फरियाद तथा चौथे का मन फौलाद” मुनि श्री ने कहा कि चार प्रकार के लोग होते है कुछ शिकायती स्वभाव वाले, कुछ आभार प्रकट वाले,कुछ फरयादी बने रहते है तथा कुछ फौलादी बनते है” संत कहते है अपने जीवन में शिकायत के स्थान पर धन्यवाद के भाव जगाइये अपने अंतर मन में उतरकर देखिये कि आपको तो किसी से कोई शिकायत नहीं? यदी है तो उसकी लिस्ट बनाइये? और देखो आखिर किससे शिकायत है? भगवान से,परिवार से,जीवन की व्यवस्था से, स्वयं से,समाज से, अथवा हो सकता है मुझसे भी हों कि महाराज आप हमें समय ही नहीं देते मुनि श्री ने कहा कि सबको सबसे शिकायत हो सकती है लेकिन यह तो देखिये कि आपको जो मिला है उससे तो कही लोग वंचित है तो आप उसके लिये अपने अंदर धन्यवाद का भाव लाइये मुनि श्री ने कहा अपनी सोच को सकारात्मक बनाइये जब आपके अंदर से शिकायतें समाप्त हो जाएगी,तो आपके अंदर शांती सामंजस्य,और प्रेम स्थापित हो जाएगा और सारी दूरीयां समाप्त होकर सारे झगड़े समाप्त हो जाएगे।
उपरोक्त जानकारी देते हुये प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया प्रत्येक सोमवार को मुनि श्री का मौन के साथ उपवास रहता है अतः सभी कार्यक्रम स्थगित रहते है,अगला प्रवचन मंगलवार को प्रातः8:30 बजे एवं शंकासमाधान सांयकाल 6:20 से होगा।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312


