मां” संस्कारवान होगी तो बच्चा भी संस्कार वान होगा”- मुनिश्री प्रमाणसागर

धर्म

“मां” संस्कारवान होगी तो बच्चा भी संस्कार वान होगा”- मुनिश्री प्रमाणसागर

 भोपाल (अवधपुरी)”अच्छे संस्कारों में पलने वाले मनुष्यों में अच्छे गुण विकसित होते है””घर” के वातावरण का प्रभाव बच्चों पर बहुत जल्दीपढ़ता है,बच्चे जैसा देखते है वैसे संस्कार उनके अंदर बनते है” उपरोक्त उदगार मुनिश्री प्रमाणसागर महाराज ने “भावनायोग” प्रवचन माला के अंतर्गत प्रातःकालीन धर्मसभा में व्यक्त किये। 

मुनि श्री ने कहा कि “संस्कारों”को बदलने में एक “मां” की महत्वपूर्ण भूमिका होती है,”मां” के पेट में पलने वाले बच्चे का मां के संस्कारों का बहुत गहरा प्रभाव होता है,मां और बच्चे के बीच का संवाद तो जन्म के पहले से ही शुरु हो जाता है,”मां”यदि संस्कार वान है तो बच्चा भी संस्कारवान होगा”यह पक्का है। मुनि श्री ने कहा जैसा वातावरण बच्चों को मिलता है वैसे संस्कार उनके अंदर आते है,उन्होंने प्रत्यक्ष उदाहरण ऐम्ब्राड से आये 7 साल के बच्चे “पुरु” का दिया जिसके अंदर अपनी मां के संस्कार कूट कूट कर भरे थे आप सभी लोगों ने उसे देखा उस छोटे से बच्चे से हर कोई प्रभावित हुआ। मुनि श्री ने कहा कि जीवन के प्रारंभ से ही यदि मां बाप बच्चों को अच्छे संस्कारों से संस्कारित करें तो उनका भविष्य सुधर जाता है।उन्होंने कहा कि जब एक नन्हे से बींज को मिट्टी में बोने के पश्चात उसकी खरपतवारों से रक्षा निंदाई गुड़ाई तथा खाद पानी की व्यवस्था करना पड़ती है,तब कंही जाकर वह एक विशाल वृक्ष का रुप धारण कर फूल और फल प्रदान करता हुआ अनेक अनेक बींजों को उत्पन्न करता है,इसके विपरीत यदि बीज किसी चट्टान पर पड़ कर सड़ जाये तो उस बींज का अस्तित्व ही मिट जाता है,जैसे बीज की सार्थकता वृक्ष के रूप में विकसित हो जाने से होती है,उसी प्रकार हमारे जीवन मूल्यों की सार्थकता उत्तम संस्कार से होती है, जैसे बीज के अंदर जैसा खाद पानी पड़ता है उसकी वैसी तासीर बन जाती है,उसी प्रकार एक बच्चा अच्छे संस्कार तथा परिवेश में पलता है उसका जीवन भी वैसा बन जाता है। घटना सुनाते हुये कहा जयपुर से सांगानेर विहार चल रहा था, रास्ते में गेंहूँ की लहलहाती फसल दिखी तो मेरे मुख से निकल गया कितनी अच्छी फसल है लगता है, यहा सिंचाई के साधन बहुत अच्छे है,तो साथ चल रहे व्यक्ति ने कहा कि महाराज यह फसल लहलहा तो रही है,लेकिन फसल अच्छी नहीं है, इस सारे गेंहूँ में बदबू आती है! मैं आश्चर्य में पड़ गया मेंने पूछा ऐसा क्यो?तो उसने बताया सांगानेर के कपड़ों का प्रोसेस होता है उसके बेस्ट से निकले गंदे पानी से इसकी सिंचाई होती है, उसका असर इस गेंहूँ की पूरी फसल पर पड़ता है” मुनि श्री ने कहा कि जब गंदे पानी के सिंचन से”बीज” गंदा होकर विकसित और पुष्ट तो हुआ लेकिन उसका स्वाद विक्रत हो गया उसी प्रकार” यदि जीवन गंदे वातावरण में रहेगा तो वह जीवन तो गंदा होगा ही होगा वह समाज में भी विक्रति उत्पन्न करेगा” मुनि श्री ने कहा अच्छे संस्कारों में पलने वाले मनुष्यों में अच्छे गुण विकसित होते है” “बुरे संस्कारों में पले बड़े लोगों का स्वभाव उनकी प्रवृति उनका आचरण और उनका व्यवहार सब उल्टा हो जाता है”सवाल संस्कारों का है, “संस्कार” जीवन के शुद्धीकरण या निर्मलीकरण का नाम है” एक पत्थर को ठीक तरह से तराशा जाए और उसकी अशुद्धियों को दूर किया जाये तो उस पत्थर से भगवान प्रकट हो जाते है यही संस्कार का सबसे बड़ा चमत्कार है। “संस्कार” हमारे चित्त और चेतना में जमे हुये वह चिन्ह है जो हमारे समस्त व्यवहार,मानवीय संबंधों, हमारी प्रवृतियों और हमारे निर्णय क्षमता को प्रभावित करती है””हम जैसे संस्कार में पले बड़े होते है हमारे अंदर सबकुछ वैसा ही घटित होंने लगता है” अच्छे संस्कारों के बीच पले और बड़े हुये व्यक्ती के संस्कारों में बड़ी विनम्रता, मधुरता, शालीनता होती है,उसके निर्णय बहुत गम्भीर और शांत होते है,उसके विपरीत यदि कोई गलत संस्कारों के बीच पला और बड़ा व्यक्ती है तो उसके संस्कार भी वैसे ही हो जाते है। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया 9अगस्त शनिवार को पूर्णिमा तथा “रक्षाबंधन”पर्व है प्रातः7 बजे से मंगलाचरण अभिषेक के पश्चात 55 मिनट की वृहदशांतिधारा मुनि श्री के मुखारविंद से होगी इस दिवस अकम्पनाचार्य आदि 700 मुनिओ की उपसर्ग से रक्षा हुई थी अतः700 मुनिराजों को अर्घ समर्पित करते हुये रक्षाबंधन पर्व मनाया जाएगा।

       संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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