जंगल वाले बाबा चिन्मय सागर महाराज का आशीष एवम सान्निध्य रामगंजमंडी नगर को भी प्राप्त हुआ था महाराज श्री के अवतरण दिवस पर अभिव्यक्ति
जंगल की साधना करते हुए इस काल में ऐसे संत जिन्हें हम जंगल वाले बाबा चिन्मय सागर महाराज के नाम से जानते हैं। वे हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन उनकी साधना उनके मार्ग आज भी जीवंत है। आज अवतरण दिवस पर उन्हें नमन करते हैं।
2007 के रामगंजमंडी प्रवास से जुड़ी स्मृति
रामगंजमंडी राजस्थान कोटा जिले का वह नगर है जो व्यापारिक दृष्टिकोण से कोटा स्टोन वह धनिए के लिए तो जाना जाता है, लेकिन धार्मिक दृष्टिकोण से भी इसे पहचाना जाना जाता है।
धार्मिक दृष्टिकोण से हम रामगंज मंडी से जुड़ी उस स्मृति को ताजा करने का प्रयास कर रहे हैं। जो यह दर्शाती है कि यहां पावन संतों के चरण और आशीष इस नगर को सदा मिलती रही है।

20 दिसंबर 2007 का पल जंगल वाले बाबा मुनि श्री चिन्मय सागर महाराज रावतभाटा कोटा के समीप कोलीपुरा के जंगलों में वर्षा योग संपन्न होने के बाद रामगंजमंडी नगर में मंगल आगमन हुआ था। नगर में गुरुदेव की भक्तों ने अभूतपूर्व अगवानी की थी।

महाराज श्री ने मूलनायक शांतिनाथ भगवान की प्रतिमा को एक टक निहारा उसके उपरांत गुरुवर की वाणी सुनने का अवसर प्राप्त हुआ।
गुरुदेव चरणों की रज आशीष पाकर धन्य हुआ
संध्या की बेला में मुझे ऐसे पावन गुरुदेव की चरण रज की आशीष के साथ उनकी वेयावृति का स्वर्णिम अवसर प्राप्त हुआ। वेयावृति से पूर्व पूज्य माताजी संघ एवं महाराज श्री के मध्य धर्म चर्चा गदगद करने वाली थी पूज्यश्री कोटा के जंगलों में जो धर्म साधना हुई वर्षा उसे बताया सुनकर लगा ऐसे निस्पृही निर्मोही साधक रामगंजमंडी में पधारे यह नगर के लिए किसी महापुण्य से कम नहीं है। निश्चित रूप से ऐसे क्षण सदा सदा के लिए नगर के लिए अविस्मरणीय और अमिट बन गए। 
21 dec 2007 को आहारचर्या उपरांत शाहजी चौराहा पर मुनि श्री ने धर्म सभा को संबोधित किया था उस समय माताजी की ओर से एक भावभीना भजन मुनि चरणों में समर्पित किया।इस अवसर पर पूज्यश्री ने अपने उद्बोधन में अहिंसा शाकाहार का पालन करने की बात सभी को कई। इस धर्म सभा का संचालन श्रीमान केवलचंद रावका ने किया। इस बेला में अनेक विशिष्ट व्यक्तियों ने भी अपनी सहभागिता प्रदान की। मुनि श्री ने धर्मसभा में सभी को मांसाहार का त्याग करवाया।
जैन संत तो अनियत बिहारी होते हैं उनके आने न जाने की कोई तिथि नियत नहीं होती है। मुनि श्री ने अपना उद्बोधन पूर्ण किया पूर्ण करते ही मुनि श्री का मंगल विहार हो गया। मुनि श्री ने अपनी वाणी से, अपनी प्रेरणा से ना जाने कितनों का जीवन अन्नत किया। वे आज हमारे बीच नहीं है लेकिन उनकी स्मृति उनका त्याग उनका समर्पण उनका संयम सदा सभी के लिए एक प्रेरणा एवं आदर्श स्थापित करता है। पूज्य श्री की प्रेरणा व आशीष से आरके पुरम जिन मंदिर का निर्माण हुआ है। इसके साथ ही इसका पंचकल्याणक 2008 में पूज्य मुनि श्री के सानिध्य में ही संपन्न हुआ था।
अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमंडी की रिपोर्ट





