राग मे कमी करना प्रशम भाव है आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज आचार्य श्री ने कहा संकल्प करो कि जब भी मंदिर आएगे तो मोबाइल लेकर नहीं आएंगे
रामगंजमंडी
परम पूज्य आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज ने सम्यक दर्शन को समझाया उन्होंने कहा सांसारिक जीव की आस्था कहीं ना कहीं होती है अंतर इतना है कि मिथ्यात्व पर होती है या सम्यक पर होती है। विश्वास तो करना ही पड़ता है कुदेव पर कर ले चाहे सच्चे देव पर कर ले। वस्तु के सही स्वरूप पर कर ले या विपरीत स्वरूप पर कर ले वस्तु के सही स्वरूप पर विश्वास करने वाला व्यक्ति सम्यक दृष्टि होता है। विपरीत पर विश्वास करने वाला व्यक्ति मिथ्या दृष्टि होता है।
उन्होंने कहा क्रिया का महत्व नहीं श्रद्धा का महत्व है आपका श्रद्धा विश्वास कैसा है वह कौन है। सम्यक दर्शन का कार्य सच्चाई से जोड़ना है वह आभास दिलाता है और सत्य को पहचानता है। मार्ग सब जानते हैं लेकिन मार्ग सच्चा है या झूठा यह हम नहीं जानते।

एक उदाहरण के माध्यम से बताया कि शरीर को सब जानते हैं लेकिन यह नहीं जानते कि शरीर जीव नहीं है दुकान मकान के लिए सब कहते हैं कि यह मेरा है यह नहीं जानते कि यह संयोग है अंतर इतना ही है कि वस्तु का सही स्वरूप पहचाना सम्यक दर्शन है विपरीत को पहचानना मिथ्यात्व है।
प्रशम भाव और समभाव को समझाते हुए आचार्य श्री ने कहा कि राग छोड़ने का प्रयास करें तो प्रशम भाव एवं समभाव है राग को बढ़ाने से राग बढ़ता है मोबाइल का उदाहरण देते हुए कहा कि मोबाइल सबके पास खाली बैठे हैं तो रील आदि देखने लगते है फिर थोड़ी देर बाद दोबारा देखने का मन हो गया तो राग बढ़ गया।
उन्होंने कहा पहले 15 दिन में पत्र आता था कि सूतक भी खत्म हो जाता था मृत्यु आदि की सूचना बाद में मिलती थी लेकिन मोबाइल ने राग आदि को बढ़ाया।




उन्होंने कहा राग प्रशम भाव को समाप्त करता है एक उदाहरण के माध्यम से बताया कि सोने के बर्तन में खाना खाया जा सकता है लेकिन बनाया नहीं जा सकता। सोने चांदी के बर्तन में पूजा करने से आस्था नहीं बनेगी आस्था तो चेतन भाव से बनेगी। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि आज यह संकल्प ले की हम जब भी मंदिर आएगे मोबाइल लेकर नहीं आएंगे।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312


