*जिसकी सोच बड़ी होती है उसका कोई बैर,विरोध नहीं होता मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज
भोपाल
“जिस पेड़ की जड़ में ही कीड़ा है,वह कभी हरा भरा नहीं हो सकता,उसी प्रकार हमारा जीवन है यदि “नकारात्मकता” का कीड़ा एक बार बैठ जाए तो वह जीवन हरा भरा नहीं हो सकता “ईर्ष्या” एक ऐसा ही दुर्गुण है जो आपके जीवन व्यवहार को खोखला कर रहा है”उन्होंने कहा कि ईष्या एक ऐसी आग है जो हमारी चेतना को विदग्ध कर अंदर ही अंदर सुलगती रहती है,और हमारी शक्ति को नष्ट कर देती है।
उन्होंने कहा कि अपना अपना आंकलन कीजिये कि मैं कंहा हूँ? मेरी स्थिति क्या है? उन्होंने ईर्ष्या का लक्ष्य, कारण, परिणाम,और ईर्ष्या से मुक्ति का उपाय इन चार बातों पर चर्चा करते हुये कहा कि सबसे पहले इस बात को जांचिए ईर्ष्या मेरे अंदर है या नहीं? मुनि श्री ने कहा कि हमारे मन में यह तो आ जाता है कि सामने वाला हमसे ईर्ष्या करता है लेकिन हमारे अंदर तो यह दुर्गुण नहीं उन्होंने इसके जांचने का उपाय बताते हुयै कहा कि यदि आप किसी की प्रगति और उसे आगे बढ़ता देखकर उसकी प्रशंसा को न सह पा रहे हो,तो यह ईर्ष्या का ही लक्षण है। यदि किसी की प्रगती दिखती है तो उसकी प्रगति से प्रेरणा लोउन्होंने “मेरी भावना” की ये पक्तियां “देख दूसरों की बढ़ती से कभी न ईर्ष्या भाव रखूं”






उन्होंने कहा किअपनी अयोग्यता की अनदेखी करना,तथा दूसरों की योग्यता पर प्रश्न चिंन्ह लगाना. यह ईर्ष्या है। देवरानी मायके से मोतीओं का कड़ा लेकर आई तो जिठानी देखकर जल गई और उसने कहा कि ये मोती नकली है असली होंगे तो दांतों से टूट जाएगें तो देवरानी बोली जिठानी जी असली मोती के लिये दांत भी असली चाहिये उन्होंने कहा कि एक स्थान पर दो विद्वान थे लेकिन वह एक दूसरे से ईर्ष्या करते एक ने एक को बैल कहा और दूसरे ने उनको निपट गधा तो आयोजक ने दूसरे दिन दोनों को भोजन के लिये आमंत्रित किया तो एक थाली में भूसा तथा दूसरे में हरी घास रख दी यह देख दोनों भड़क गये और कहा कि यह क्या बदतमीज़ी है? तो उन्होंने कहा कि एक बैल और गधा के लिये तो यही भोजन होता है। दोनों विद्वानों ने एक दूसरे को देखा और शर्मिंदगी महसूस करते हुये माफी मांगी दूसरों की प्रशंसा को न सहपाना एक बहुत बड़ी दुर्बलता है।उन्होंने कहा कि एक दूसरे को देखकर ईर्ष्या करना उन्होंने कहा कि लोग अपनी योग्यता को बढ़ाने की बजाय पक्षपात का आरोप लगाते है यह ईर्ष्या है जो हमारे भीतर के एश्वर्य को खोखला कर देती है। मुनि श्री ने कहा कि ईर्ष्या किसी को किसी की बढ़ती देखने नहीं देती उन्होंने कहा कि”अहमन्यता”अर्थात मैं ही सब कुछ हूँ यह आपको आगे नहीं बढ़ने देती “असहिष्णुता”अनुदारता”ओछी मानसिकता”से भी सब कुछ अच्छा होने पर भी उसमें मीन मेक निकाल कर आपसी संबंधों को बिगाड़ लेते है।
मुनि श्री ने कहा कि गुरुदेव हमेशा कहा करते थे”जिसकी सोच बड़ी होती है उसका कोई बैर,विरोध नहीं होता” उपरोक्त जानकारी देते हुये प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने देते हुये बताया की आज क्षुल्लक समादर सागर महाराज के कैश लोंच संपन्न हुये एवं उनका उपवास रहा।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
