जब आचार्य विद्यासागर जैसा तपस्वी आत्मा सूर्य उदित होता है तो, दसों दिशाएं आलोकित हो उठती हैं प्रमाण सागर महाराज 

धर्म

जब आचार्य विद्यासागर जैसा तपस्वी आत्मा सूर्य उदित होता है तो, दसों दिशाएं आलोकित हो उठती हैं प्रमाण सागर महाराज 

   भोपाल 

कहीं दीप जलता है, कहीं सूर्य उगता है,पर जब आचार्य विद्यासागर जैसा तपस्वी आत्मसूर्य उदित होता है,तो दसों दिशाएं आलोकित हो उठती हैं” उपरोक्त उदगार आचार्य गुरुदेव विद्यासागर महाराज की 58 दीक्षा तिथी पर मुनिश्री प्रमाण सागर महाराज ने व्यक्त किये।

 

 

 

 मुनि श्री ने चार सूत्रीय संकल्प प्रस्तुत करते हुये कहा कि — जैन बनाओ, जैन बढ़ाओ, जैन बचाओ, जैन बसाओ उन्होंने गुरुदेव द्वारा रचित हायकू के माध्यम से कहा कि “एक दिशा में सूर्य उगे,तो दसों दिशाएं प्रसन्न हों” मुनि श्री ने कहा, “दीप सीमित प्रकाश देता है, पर जब सूर्य उगता है, तो सृष्टि तक उजियारा फैलता है। आचार्य विद्यासागर जी महाराज ने मिथ्यात्व के अंधकार को चीरते हुए ज्ञान,तप और संयम का ऐसा प्रकाश फैलाया, जो युगों युगों तक पथ प्रदर्शक बना रहेगा।”

 

विराट व्यक्तित्व की झलक पंच तत्वों से बना एक दिव्य साधक*महाराज श्री ने कहा गुरुदेव को केवल एक जैन आचार्य कहकर संबोधित करना उनके विराट स्वरूप को सीमित करने जैसा होगा। कार्यक्रम में उद्धृत आचार्य कुंदकुंद के पद के माध्यम से बताया गया कि उनमें पृथ्वी समान क्षमा, जल समान शीतलता, अग्नि समान तप, वायु समान निर्विकल्पता और आकाश समान व्यापकता एक साथ विद्यमान थी।

गुरुदेव ने दिखाया रास्ता, अब हमारी ज़िम्मेदारी है उस पर चलना 

मुनि श्री ने कहा कि आचार्यश्री ने कुछ नहीं किया, सिर्फ प्रेरणा दी — और वह प्रेरणा इतनी प्रभावशाली थी कि संकेत से ही काम हो जाता था। उन्होंने कहा “अब समय है कि हम उस मार्ग को सिर्फ चलें नहीं, उसे संरक्षित करें, उस पर औरों को चलाएं और उस मार्ग को आगे बढ़ाएं।” मुनि श्री नेचार सूत्रों की घोषणा करते हुये कहा कि जैन धर्म के नवजागरण का संकल्पगुरुदेव की स्मृति में चार क्रांतिकारी सूत्र दिए गए:

1. जैन बनाओ – जन्म से नहीं, कर्म से जैन बनाओ।

2. जैन बढ़ाओ – जैनों को शिक्षित, संगठित और समर्थ बनाओ।

3. जैन बचाओ – संतति को बढ़ाकर संस्कृति को बचाओ।

4. जैन बसाओ – जैन जीवनशैली को समाज में प्रतिष्ठित करो।

             

 

गुरुकुलम से विश्वविद्यालय तक : शिक्षा ही बनेगी बदलाव की नींव 

मुनि श्री ने कहा कि भोपाल में स्थापित श्री विद्याप्रमाण गुरुकुलम् गुरुदेव की विशेष कृपा का प्रतीक है,अब अगला लक्ष्य एक अंतरराष्ट्रीय स्तर के जैन विश्वविद्यालय की स्थापना का है, जो ज्ञान, विज्ञान और संयम का केंद्र बनेगा। गुरुकुलम से निकले छात्र ‘जैन बनाओ, बढ़ाओ, बचाओ, बसाओ’ के सूत्रों के संवाहक बनेंगे।

 

 गुरु की भक्ति पूजा नहीं, उनके संकल्प की पूर्ति है”

गुरुदेव की दीक्षा तिथि पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि गुरु की सच्ची भक्ति आरती नहीं, उनके दिखाए मार्ग पर चलकर उनके दृष्टिकोण को समाज में प्रतिष्ठित करना है।

 

 

सभा का समापन एक भावपूर्ण कविता से हुआ —

“क्या मेरा है जो आज तुम्हें दे डालूं,

मेरे अपने शब्द कहाँ जुगा लूं…” केवल स्मरण नहीं, समर्पण चाहिए। गुरुदेव की दृष्टि ही अब हमारा मार्गदर्शक बने। “जहाँ गुरुदेव, वहीं हम” का संकल्प लेकर सभी श्रद्धालु, युवावर्ग और समाज के प्रबुद्धजन इस नई दिशा में जुटें। मुनि श्री ने भोपाल जैन समाज सहित देशभर के श्रद्धालुओं से आह्वान किया गया कि वे श्री विद्याप्रमाण गुरुकुलम् और प्रस्तावित जैन विश्वविद्यालय से जुड़कर गुरुदेव के स्वप्न को साकार करें। मुनिसंघ के प्रवक्ता अविनाश जैन ने जानकारी देते हुये बताया मुनि श्री संघ का चातुर्मास विद्या प्रमाण गुरुकुलम् अवधपुरी में निश्चित हो गया है।आगामी 13 जुलाई को चातुर्मास कलश की स्थापना होगी।मुनिसंघ अभी 1100 क्वाटर अरेरा कालोनी में विराजमान है।

          संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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