धर्म संकट को टालता नहीं बल्कि धर्म संकट में संभलना सिखाता है प्रमाण सागर महाराज 

धर्म

धर्म संकट को टालता नहीं बल्कि धर्म संकट में संभलना सिखाता है प्रमाण सागर महाराज 

   भोपाल

होकर सुख में मग्न न फूले, दुःख में कभी न घबरावे” धर्म” संकट को टालता नहीं, धर्म संकट में संभलना सिखाता है” उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने बाबड़िया कला के विद्याप्रमाणगुरुकुलम् में धर्म के वास्तविक प्रयोजन विषय पर चर्चा करते हुये व्यक्त किये।

 

 

 

 

” प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया मुनि श्री ने “धर्म के वास्तविक प्रयोजन” विषय पर आत्म-जागृति से भरा हुआ प्रवचन प्रदान किया। कार्यक्रम में सैकड़ों श्रद्धालु, साधकगण एवं विचारशील युवा उपस्थित थे।

प्रवचन की शुरुआत में एक जिज्ञासु ने प्रश्न किया — “गुरुदेव, मोक्ष मार्ग की शुरुआत कहां से होती है? का उत्तर देते हुये कहा कि स्वयं की पहचान से” उन्होंने प्रतिप्रश्न किया बताइये आप लोग धर्म क्यों कर रहे हैं? तो किसी ने कहा मोक्ष के लिए, तो किसी ने कहा- आत्मकल्याण के लिए तो किसी ने कहा शांति के लिए, तो किसी ने कहा पुण्य के लिए…मुनिश्री ने हर उत्तर को सत्यता की कसौटी पर परखा और कहा कि बोलिये“यदि आज मोक्ष का मौका आपको दे दिया जाए तो क्या आप मोक्ष जाने आप तैयार हैं?

मुनि श्री ने कहा आप लोग मात्र धर्म की बातें करते हैं, पर तैयारी संसार की ही करते हैं ये आत्मवंचना है।

उन्होंने कहा कि अधिकांश लोग धर्म इसलिये करते है कि यह हमारी परंपरा है दूसरा हमारा परलोक सुधर जाये सदगति मिले, तीसरे वह लोग है जो अपने ऊपर आये संकट टालने के लिए धर्म करते है तथा चौथे वह व्यक्ति है जो कि कुछ पुण्य कमाने के लिये मुनि श्री ने कहा इन चारों कारणों में कोई ही कारण आत्मदर्शन या आत्मकल्याण की ओर नहीं ले जाता।

 

 

 

 उन्होंने कहा कि धर्म का उद्देश्य केवल स्वर्ग या संकट से बचना नहीं, बल्कि स्वयं को पहचानकर आत्मबल आत्मोन्नति को प्राप्त करना है।”उन्होंने स्पष्ट करते हुये कहा कि“धर्म का कार्य है — तुम्हें स्थिर बनाना, न कि बाहरी परिस्थितियों को बदलना,जब आत्मा से साक्षात्कार हो जाता है तो कोई भी संकट तुम्हें डिगा नहीं सकता।”उन्होंने उदाहरण देते हुये कहा कि भगवान पारसनाथ ने दस भवों तक धर्म भी किया और संकट भी झेले,धर्म का एक ही सार है आत्मा को पवित्र करना“पुण्य कोई गिनती या कल्पना नहीं है पुण्य वही है जो आत्मा को पवित्र करे। इसलिए धर्म करो — पुण्य कमाने के लिए नहीं, जीवन को पुण्यमय बनाने के लिए।”“धर्म वह है जो चेतना को निर्मल बनाए, अंतर्मन में पवित्रता लाए उन्होंने आत्मदृष्टि की प्रेरणा देते हुये कहा कि यही भावना योग है। जब आत्मा की शुद्धता का अनुभव हो जाता है, तो दुख, अपमान, क्लेश — सब व्यर्थ हो जाते हैं।”

      संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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