आत्महत्या करना सरल है, परन्तु परिग्रह त्याग करना कठिन है कनकनदी गुरुदेव
भीलूड़ा
आत्मज्ञानी वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव में अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में परिग्रह के विषय में बताया उन्होंने कहा परिग्रह में पांचों पाप, समस्त कषाय हैं। तीर्थंकर भी गृहस्थ अवस्था में दो कल्याणक तक परिग्रह त्याग नहीं कर पाते हैं। तीर्थंकरों को भी घर में रहते हुए केवल ज्ञान, मोक्ष नहीं होता, जब सभी प्रकार के परिग्रह का त्याग कर दीक्षा लेते हैं। तब मनपर्यय ज्ञान तथा तपस्या ध्यान करने के बाद केवल ज्ञान मोक्ष होता हैं।
आत्महत्या करना सरल है, परन्तु परिग्रह त्याग करना कठिन है कनकनदी गुरुदेव कटाक्ष लेते हुए कहा की धन के लिए पढ़ाई, व्यापार, नौकरी, भ्रष्टाचार, मिलावट, अन्याय, अत्याचार, चोरी आदि होते हैं। धर्म भी धन के लिए करते हैं। लोगों को जिनवाणी की निंदा रूप घोर पाप करने के कारण आगम का विषय याद नहीं रहता हैं। बहुत सारे व्यक्ति सोच नहीं पाते हैं अतः आत्महत्या करते हैं। विष पीना सरल है, आत्महत्या करना सरल, परंतु परिग्रह का त्याग करना अति कठिन हैं। परिग्रह को त्याग करना गृहस्थ के लिए बहुत कठिन हैं। शरीर को मैं मानना घोर पाप है। मैं अकेला हूं शुद्ध हूं।
आचार्य श्री ने आगे कहा की एक परमाणु भी तुम नहीं, तुम्हारा नहीं है इसको मेरा मानना घोर परिग्रही होना हैं। यह शरीर भी परिग्रह हैं। राग ,द्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभ आदि भी परिग्रह है। सभी जीव परिग्रह में डूबे नहीं परिग्रह से ही बने हुए हैं।
तुम्हारा परिग्रह मुझे दे दो
अपने उद्बोधन में कहा की तुम्हारा परिग्रह मुझे दे दो इस दृष्टि से उपदेश नहीं दे रहे हैं आचार्य श्री का उद्देश्य शिष्य व भक्तों के पाप दूर करने के लिए अपरिग्रह का उपदेश दे रहे हैं। परिग्रह के लिए, सतत धन इकट्ठा करने के लिए यह जीव सभी प्रकार के पाप करता हैं। आत्म तत्व को छोड़कर सभी परिवार के सदस्य, शरीर, मन, मन में उत्पन्न होने वाले भाव, धन-संपत्ति, घर, मिथ्यात्व, विवाह, पत्नी के लिए पति, पति के लिए पत्नी भी परिग्रह हैं। वेद, राग, नो कषाय, क्रोध, मान, माया, लोभ आदि अंतरंग परिग्रह हैं। अंतरंग परिग्रह से ही बाह्य परिग्रह होते हैं।मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने मंगलाचरण में परिग्रह से संबंधित दो कविताएं सुनाई “कोई किसी का मालिक नहीं स्वयं का स्वयं ही मालिक है” उन्होंने बताया कि धन से प्रेरित होकर ही सभी जीव चोरी भ्रष्टाचार ठगी अन्याय अत्याचार सब करता है परिग्रही, लोभी जीव मरते हुए जीवो से भी ठगी, चोरी करके महान पाप करता है। जब तक निर्लोभ, संतोष नहीं आएगा तब तक यह अनैतिक कार्य करते ही रहता है। आचार्य श्री विद्या नंदी गुरुदेव ने बताया कि अध्यात्म को समझने के बाद चारित्र में बदलाव आता हैं। जहां परिग्रह है वहां हिंसा अवश्य होती है। बाहरी हिंसा के साथ-साथ आत्मा की हिंसा अवश्य होती है अपने स्वभाव से स्खलित
होने को ही हिंसा कहते हैं। जिन वस्तुओं के प्रति मुर्छा का भाव है वह परिग्रह है। संपत्ति पाप कर्म के उदय से नहीं हो परंतु संपत्ति की चाह, राग, प्राप्त करने की लालच का होना संपत्ति नहीं होने पर भी परिग्रह ही हैं। आचार्य श्री कनक नंदी शब्दार्थ के साथ-साथ भावार्थ, विवेचना अधिक करते हैं। भावात्मक दृष्टि से समझना बड़े भाग्य से होता है। इसके बाद विजयलक्ष्मी,प्राध्यापक सुरेंद्र जैन, श्रीपाल जैन आदि ने भी परिग्रह संबंधी आचार्य श्री से प्राप्त ज्ञान को साझा किया।
विजय लक्ष्मी गोदावत से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमडी
