अशोकनगर वालों का हक बनता है उनकी मेहनत और लगन के कारण-मुनि पुंगव श्रीसुधासागरजी महाराज चातुर्मास हेतु अशोक नगर थूबोनजी कमेटी ने किए श्री फल भेंट

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अशोकनगर वालों का हक बनता है उनकी मेहनत और लगन के कारण-मुनि पुंगव श्रीसुधासागरजी महाराज चातुर्मास हेतु अशोक नगर थूबोनजी कमेटी ने किए श्री फल भेंट
अशोकनगर -सन 1992 में अशोक नगर में त्रिकाल चौबीस स्थापना कराकर तीर्थ का दर्जा दिलाने वाले निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव 108 श्रीसुधासागर महाराज के चातुर्मास का निवेदन लेकर अशोक जैन समाज पंचायत व थूबोनजी कमेटी एक वृहद प्रतिनिधि मण्डल ने केसली पहुंच कर मुनि पुंगव श्रीसुधासागर महाराज को श्री फल भेंट किया। जहां मुनि श्री ने कहा कि वर्षों की मेहनत और लगन के बाद तो अशोक नगर वालों का हक बनता है।

 

 

गुणवान को देख कर हर्षित होने पर गुण आप के अंदर आ जायेगे
इस दौरान मुनिश्री ने कहा कि अशोक नगर जैन समाज व थूबोनजी कमेटी वर्षो से मेहनत और लगन के साथ समर्पित भाव से काम कर रहे हैं उनका हक तो बनता है और उन्हें अधिक भी है जय बोलना भी एक पूजा है, जब हम किसी गुणवान को देखकर हर्षित होते हैं तो वे गुण हमारे अंदर एक दिन प्रकट हो जाते है। जब गुणवान को देखकर अल्हाद भाव आता है तो उसकी पूजा, भक्ति करना, जय बोलना ये सब पूजा के अंग है जब किसी भगवान को देखकर हम पूजा करते हैं तो तीन लाभ होते हैं जिसकी हम जय बोल रहे हैं, एक दिन हम भी उन जैसे बनेंगे और हमारी जयकार होगी।हमारे अशुभ कर्मों की निर्जरा होती है, पापकर्म क्षय को प्राप्त होते है हमारे अंदर जो शक्तिहीनता है, वह खत्म होती है।

 

उच्च गोत्र का, यशस्कीर्ति कर्म का बंध होता है
मुनि पुंगव ने कहा कि कोई भी पाप करते समय पुण्य का उदय होता है, बिना पुण्यकर्म के कोई भी स्थिति नहीं बनती इसलिए पाप करते समय आनंद आता है और अशुभकर्म का बंध होता है लेकिन जब वह उदय में आता है तो वह दुख देता है अहंकार जितनी ज्यादा ऊंचाई पर जाता है उतना ही गहरा वह गिरता है। अहंकार सम्यकदर्शन को भी नष्ट कर देता है।नम्रता का मूल स्रोत होता है व्यक्ति का ज्ञान, जैसे-जैसे सही मायने में व्यक्ति स्वाभिमानी हो जाता है, उतना ही उसका अहंकार कम होता है।

पड़ोसी की थाली नहीं, अपनी जठराग्नि देखकर भोजन करें
उन्होंने कहा कि पड़ोसी की थाली नहीं अपनी जठराग्नि देखकर भोजन करना तो कभी हताश नहीं होंओगे। झोपड़ी में रहने वाला महलों को याद करेगा तो वह हताश होगा। उसके मन में आ जाए कि मेरी किस्मत में झोपड़ी है, झोपड़ी ही मेरा महल है तो वह उस झोपड़ी में भी महल का आनंद ले सकता है माता-पिता की सेवा तुम्हारे बिना हो सकती है तो फिर मुनिपद धारण करना चाहिए। तुम्हारे बिना उनकी सेवा होगी नहीं तो फिर उस पर विचार करना चाहिए। यदि हम सेवा नहीं करेंगे तो उनके व्रत नहीं पलेंगा, धर्म नहीं पलेगा तो फिर विचार करना चाहिए। यदि मोह है तो फिर मोह को ठुकरा देना चाहिए। दुश्मन की कितनी भी अच्छी चीज हो, बुरी ही लगती है, वही से उसका विनाश चालू जाता है। सामने वाला तो तुम्हें दोष की दृष्टि से देख रहा है लेकिन तुम्हारी यदि निर्दोष स्थिति है तो उसके दोष देखने से तुम दोषी नहीं हो जाओगे, नियम से सत्य की विजय होगी।

आज बच्चो को संस्कार विहीन शिक्षा दी जा रही है
मुनि श्री ने कहा एक धर्म परिणामों पर आश्रित होता है जो चरित्रात्मक त्यागात्मक होता है, उसमें धन की जरूरत नहीं है लेकिन एक धर्म वह होता है जिससे व्यक्ति को समृद्धि, वैभव, इज्जत चाहिए, उसके लिए उसको धन की जरूरत पड़ती है। धन जब धर्म की तरफ मुड़ जाता है तो भला है और जब बुरे कार्य की ओर मुड़ जाता है तो बुरा करने वाला होता है।समवशरण में जहाँ भगवान का उपदेश होता है, वहाँ श्रीमण्डप में भव्य ही होते है, अभव्य नहीं। दो प्रकार के लोग होते हैं एक भविष्य को जानकर वर्तमान पहले से सुधार लेते है और एक भविष्य में ठोकर खाने के बाद चेतते हैं। आज बच्चों को संस्कारविहीन शिक्षा देने वाले, उस समय उनको याद आएगा, जब इनके बच्चें इनके सामने ही गलत मार्ग पर जाएंगे। अच्छे लोग अपने बच्चों को लौकिक ज्ञान के साथ संस्कार भी देते है।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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