अंतर्मना प्रसन्न सागर महाराज का पतंजलि योगपीठ में तीन दिवसीय प्रवास में आचार्य श्री के दर्शन हेतु उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोशयारी पहुंचे 

धर्म

अंतर्मना प्रसन्न सागर महाराज का पतंजलि योगपीठ में तीन दिवसीय प्रवास में आचार्य श्री के दर्शन हेतु उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोशयारी पहुंचे 

हरिद्वार 

अन्तर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज का पतंजलि योग पीठ आश्रम हरिद्वार में त्रिदिवस प्रवास पतंजलि योग पीठ के संस्थापक स्वामी रामदेव एवं आचार्य बालकृष्ण जी के मंगल सानिध्य में पूर्ण हुआ। पतंजलि साधना योग पीठ हरिद्वार उत्तराखंड में साधना ओर योग के हुए संगम में लाखो करोड़ो लोग साक्षी बने।

 

 

इस पुनीत बेला में उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल रहे भगत सिंह कोश्यारी पधारे उन्होंने गुरुदेव अंतर्मना से मंगलमय आशीष लिया।

     

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोशयारी आचार्य श्री प्रसन्न सागर महाराज का आशीर्वाद लेते हुए

  स्वामी रामदेव एवं बालकृष्ण जी आचार्य गुरुवर प्रसन्न सागर महाराज संघ ने देश विदेशों के दुर्लभ फल आयुर्वेद शृंखला एवम पतंजलि योग पीठ कि कई श्रखलाओ का भ्रमण एवं अवलोकन किया! 

   

 इन पलों में गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि अगर तय है कि जो दिया है वो लोट कर आयेगा..तो क्यों ना — सिर्फ दुआ ही दुआ दी जाये…!

योग गुरु बाबा रामदेव एवं आचार्य बालकृष्ण आचार्य श्री प्रसन्न सागर महाराज का आशीर्वाद लेते हुए अभिनंदन पत्र भेंट करते हुए

यूं तो् आकृति से सभी मनुष्य एक से होते हैं, हमशक्ल होते हैं, लेकिन प्रकृति और स्वभाव से सब भिन्न-भिन्न होते हैं। संसार में तीन तरह की प्रकृति वाले मनुष्य है। एक छोटा सा उदाहरण — रिक्शा चालक रिक्शा चला रहा है —

         

 पहला आदमी — रिक्शे में सवार है। आगे चढ़ाव पड़ता है, रिक्शा वाला उतर कर रिक्शा खींचने लगता है, यह देखकर यात्री भी उतर गया। यह यात्री मनुष्य के रूप में देवता है। क्योंकि यह दूसरों के दु:ख को दूर करने के लिए अपना सुख छोड़ दिया। दूसरा यात्री चढ़ाव फिर आता है। रिक्शा वाला उतर कर रिक्शा खींचने लगता है, लेकिन यह यात्री उतरता नहीं है। कहता है भाई — बड़ी मेहनत की कमाई है। यह यात्री पशु के समान है, जो दूसरे के दु:ख के लिए अपने सुख को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है।और तीसरा यात्री– चढ़ावा आता है, रिक्शा वाला रिक्शा खींचता है, पर उससे रिक्शा खिचता नहीं है। वह पसीना पसीना हो जाता है। रिक्शा चालक कहता है बाबूजी — ज़रा नीचे उतर आओ, बड़ी कठिन चढ़ाई है। अब चढ़ी नहीं जाती है। वो यात्री हँसता है और गुर्राकर कहता है। मूर्ख पैसे हराम के दिए क्या-? तू क्यों नहीं दम लगा के रिक्शा चलाता है-? यह यात्री शैतान है, आदमी के रूप में भेडिया है, इसे दूसरों की पीड़ा में भी आनंद आ रहा है।

 

 

 

 

यह कसौटी है अपने को परखने की। सोचिए आप क्या हैं-? आदमी अपने सत्कर्मों से ही चिर स्मरणीय बनता है। दीर्घ जीवन स्मरणीय नहीं होता है, अपितु स्मरणीय जीवन ही दीर्घ होता है। हम जीवन में सेवा कर पाएं या ना कर पाएं, परन्तु प्रातः परमात्मा से प्रार्थना रोज कर सकते हैं — हे परमात्मा! मेरे पैर अपंगो के पैर बन जाए। मेरी आँखें अंधों की आँख बन जाए। मेरे हाथ लूलो के हाथ बन जाए। दु:ख और सुख में संतप्त आंसू बहाते लोगों के लिए सांत्वना देने में वचनों का उपयोग हो। किसी गरीब या रोगी की सेवा में मेरा तन मन धन काम आये।यह प्रार्थना हर सुबह, हर व्यक्ति की जुबान पर होना चाहिए..इससे तुम्हारे जीवन को नई ऊर्जा और नई प्रेरणा मिलेगी…!!!

 

 नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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