धैर्यशाली मानव की विपत्ति संपत्ति के रूप में फलित होती है विशुद्ध सागर महाराज
उज्जैन
जीवन में उत्कर्ष को प्राप्त करना है तो धैर्य को नहीं छोड़ना। कितनी भी विपत्ति आ जाए कितनी भी पीड़ा हो धैर्य को नहीं छोड़ना। धैर्यशाली मानव की विपत्ति संपत्ति के रूप में फलित होती है। धैर्यवान के शत्रु भी सेवक बन जाते हैं। धैर्य के बिना धन नहीं मिलता, दान के बिना यश नहीं मिलता, श्रम के बिना सफलता नहीं मिलती, ज्ञान चरित्र के बिना सुख शांति नहीं मिलती।
यह उदगार आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज ने ने धर्म सभा में प्रकट किए आचार्य श्री ने कहा जीवन ऐसा जियो की लोग दुनिया तुम्हे देखकर मुस्कुरा जाए। जीवन ऐसा जियो की दुनिया तुम्हें चाहे। जीवन ऐसा जीओ की उसका अंत सुखद हो। जीवंत जीवन जियो उमंग उत्साह पूर्वक जीवन जीना सीखो।
आचार्य श्री ने कहा कि सुख से जियो, शांतिपूर्वक सभी को जीने दो। जीवन ऐसा जियो की आपके वचनों से किसी को आपके वचनों से किसी को कष्ट न हो। आपकी क्रिया से किसी को क्लेश ना हो। आपका व्यवहार मधुर हो। आपकी वाणी मिश्री से भी अधिक मीठी हो। आप जैसा सुख चाहते हैं, वैसा दूसरों को भी सुख मिले। जीना आपका अधिकार है तो दूसरों को जीने देना तुम्हारा कर्तव्य है।
कर्म के उदय से राजा रंक बन जाता है और भिखारी धनवान
आचार्य श्री ने कहा कि किसी पर सरस्वती प्रसन्न होती है किसी पर लक्ष्मी प्रसन्न होती है सबके दिन एक से नहीं होते दुनिया की विचित्र दशा है कर्म के उदय से राजा भी रंक बन जाता है भिखारी धनवान बन जाता है। सब दिन एक से नहीं होते जहां कभी पूरे कचरे के ढेर पढ़े होते थे,आज वहां महल खड़े हैं। जहां कभी महल खड़े थे वहां आज मात्र से खंडहर बने हैं। जीवन संभल संभल कर जियो दिन बदलते देर नहीं लगती। समय बहुत बड़ा बलवान होता है।
जो चिंता करता है वह शीघ्र ही चिता पर लेट जाता है
आचार्य श्री ने कहा कि चिंता चिता के समान है जो चिंता करता है वह शीघ्र ही चिता पर लेट जाता है। और असमय चिता में न जलना हो तो चिंता छोड़ो और चिंतन प्रारंभ करो। चिंता करने से भयंकर से भयंकर रोग होते हैं। ज्ञान का क्षय होता है शारीरिक बल कम होता है बाल सफेद हो जाते हैं गाल पिचक जाते हैं चेहरा तेज शून्य हो जाता है संकटों के आने पर चिंता मत करो संकट का समाधान खोजों चिंता छोड़ो सम्यक चिंतन करो।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी





