पूज्य मुनि श्री 108 विराट सागर महाराज के अवतरण दिवस पर नमन
आज के दिन लगभग 49 वर्ष पूर्व मालवा की पावन धरा हाटपिपलिया जिला देवास मध्यप्रदेश में श्रीमति हेमलता जैन, विजयकुमार जैन की कुक्षी में अमित के रूप में विराट व्यक्तित्व ने जन्म लिया।
जन्म के क्रम में परिवार में तीसरे नंबर पर थे इनसे बड़ी दो बहने सपना और चेतना के बीच में एक ही भाई होने एवम परिवार के एक मात्र पुत्र होने से सभी के राज दुलारे थे बचपन बीता लौकिक शिक्षा बीकॉम तक पूर्ण की।

इनकी दादी श्री ने इन्हें धर्म मार्ग की और अग्रसर किया नगर में जब आचार्य श्री विद्यासागर महाराज की परम शिष्या आर्यिका प्रशांतमति माताजी का प्रवास रहा इनके जीवन की दशा और दिशा दोनों बदल गई। और वैराग्य पथ की ओर बढ़ चले। समय आया और उन्होंने गुरू नाम गुरू आचार्य श्री 108 ज्ञान सागर जी महाराज की समाधि दिवस पर 2 जून 2000 को शुक्रवार की बेला में सर्वोदय तीरथ अमरकंटक में आचार्य श्री 108 विद्यासागर महाराज के समक्ष आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत को ग्रहण किया। और संसार से विरक्ति की और अपने कदम बढ़ा दिए। उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
21 अगस्त 2004 शनिवार भगवान नेमिनाथ के जन्म एवम तप कल्याण के दिन आचार्य श्री 108 विद्यासागर महाराज के कर कमलों से मुनि दीक्षा हुई इनका नामकरण हुआ मुनि श्री 108 विराट सागर महाराज। वह स्थान दयोदय तीर्थ तिलवाराघाट जबलपुर था। उस दिन आचार्य श्री ने एक साथ 25 मुनि दीक्षा थी और उसे दिगंबर पच्चीसी के रूप में जाना जाता है। जिस दिन यह दीक्षा हो रही थी पूरा पंडाल खचाखच भरा था वैसा ही आलम था जब अजमेर नगर में आचार्य श्री विद्यासागर महाराज की मुनि दीक्षा हुई थी खूब झर झर बरसात हो रही थी। वैसा ही दृश्य उस दिन परिरक्षित हुआ। शायद इंद्र देव भी हर्षित थे इतने सारे श्रावक श्रमण बनने थे।

अपने 21 वर्ष के मुनि जीवन में इन्होंने आचार्य श्री के द्वारा दिए गए नाम विराट सागर को सार्थक रूप दिया है इन्होंने धर्म की विशालता को विराटता को पल्लवित किया है।
महाराज श्री के दीक्षा लेने के उपरांत अपनी जन्मभूमि के आगमन पर अपने भावुक उद्बोधन में 18 फरवरी 2021 में कहा था
जननी जनभूमि स्वर्गादपि गरियसी उन्होंने कहा मेरी जन्मभूमि का मुझ पर बड़ा उपकार है।उन्होंने मुनि श्री प्रमाण सागर जी महाराज को ऋणी माना
और कहा जहां का अन्न पानी खाकर मे बड़ा हुआ। इस धर्म मार्ग पर आरूढ़ मे अकेला नही चला इस मार्ग मे कई लोग सहायक है। उनका,एवं जन्मभूमि का मै सदा सदा ऋणी
उन्होंने भाव भीने शब्दों से कहा था मेरी दादी जिनके संस्कार और मेरे परिवार का उपकार जिन्होंने मुझे सींचा और धर्म मार्ग पर आरूढ़ किया सदा सदा ऋणी रहूँगा।
4 जुलाई 2004 से जुड़ा संस्मरण भी सुनाया था
महाराज श्री ने 4 जुलाई 2004 से जुड़ा संस्मरण सुनाते हुए कहा था की
4 जुलाई 2004 घटनाक्रम ऐसा घटा जो मुझे इस मुकाम तक ले आया। उन्होंने कहा आदिनाथ भगवान और पार्शवनाथ भगवान की दुआ का प्रसाद है जो मुझे मुनि जीवन का स्वर्णिम अवसर मिला।
अपने जीवन के बारे में बताते हुए कहा कि मैं आभारी हूं इस नगर और यहां के लाेगाें का और सभी समाजजनाें का जिन्हाेंने मुझे यह सम्मान दिया है। मैं अभिभूत हूं नगर के सभी सामाजिक लाेगाें का। इस नगर से अटूट प्रेम है। यहां न किसी प्रकार का कोई झगड़ा और न कोई विवाद है।
मैं आभारी हूं मेरे माता-पिता, परिजनों और इष्टजनों का जिन्होंने मुझे यह जीवन दिया। हाटपिपल्या की भूमि धर्म की स्थापना करने वाली भूमि है। हाटपिपल्या के लाेग बड़े धार्मिक हैं, यहां सभी धर्म का समान रूप से सम्मान हाेता है।
अंत मे उन्होंने कहा मेरे अपने कर्मो का क्षय हो और समाधिमरण हो और सिद्ध पद की प्राप्ती कर सिद्धालय मे विराजमान हो जाऊं। आप सभी मेरे इस मार्ग में सहायक बने।
अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमडी 9929747312



