अपनी चौबीस घण्टे की क्रिया को शगुन बना लो, परिणाम कुछ अच्छा होने वाला है निकलेगा — निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज

धर्म

अपनी चौबीस घण्टे की क्रिया को शगुन बना लो, परिणाम कुछ अच्छा होने वाला है निकलेगा — निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज

छतरपुर –14 मार्च
कोई भी वस्तु तुमने प्राप्त की है क्या उससे तुम्हे आनन्द की अनुभूति हुई है। जिस भूमि पर जन्म लिया है उसके प्रति अहोभाग्य है, जिस घर में जन्मे हो, जिन माँ बाप की गोदी में खेले हो क्या कभी आनंद की अनुभूति हुई, यदि स्वयं के अंदर से एक आनंद का स्फुरण हुआ है समझ लेना जीवन के रहस्य को, इस सृष्टि को तुम बहुत जल्दी समझ जाओगे उन्होंने कहा कि दुविधा में पड़ा हुआ व्यक्ति किसी भी वस्तु का निर्णय नही कर पाता, जन्म हमारे अतीत का किया हुआ पुरस्कार है, मरण हमारे हाथ मे है नही, मरण और जन्म के बीच का जो जीवन है बस उस रहस्य को समझना है। यह रहस्य तभी समझ मे आएगा कि जब हमें जीवन को ये अनुभूति हो कल भी मैं था, बहुत अच्छा था, कल भी मैं रहूँगा, बहुत अच्छा रहूँगा ये दो घोषणाये आपको अपनी जिंदगी में करना है अपने आपके लिए, दुनिया के सामने नही यह उद्गार मुनि पुंगव श्रीसुधासागरजी महाराज ने व्यक्त किए।

 

 

 

ये संसार भगवान से नहीं भगवान की भक्ति से चलता है।

महाराज श्री ने कहा यह संसार भगवान से नही, भक्ति से चलता है, संसार यदि अच्छा करना है तो भक्ति को संभालों, उसको पहचानों जिसकी भक्ति करना है और संसार से ऊपर उठना है तो भगवान का दर्शन करते करते अनुभूति में आ जाये कि मैं स्वयं अपने ज्ञान से अपने अंदर बैठा हुआ भगवान आत्मा को देख रहा हूँ। भगवान का आलम्बन छोड़ना नही है, भगवान की वर्तमान पर्याय जैसे ही अपनी आँखों के सामने आए तुरंत हमारी भावी पर्याय का दर्शन हो जाये समझ लेना हमारा भगवान बनने में नम्बर लग गया सारे जगत में लोग भगवान की भक्ति करते है, गुरु का दर्शन करते है उसको भक्ति बोलते है और जैनदर्शन की भक्ति एक कदम आगे हैं, भगवान और गुरु के दर्शन में वो अपनी भावी पर्याय का दर्शन कर लेता है। श्रावक साधु को आहार नही देता वो आहार लेना सीखता हैं अपने घर महाराज को बुलाकर के।आहार देते देते उसको ऐसा लगता है कि मैं ही तो खड़ा हूँ जो आहार लें रहा है। दर्पण सामने हो और अनुभूति आँखो की हो, सामने भगवान हो और हमे अपनी भावी पर्याय की अनुभूति हो, सामने गुरु की अगवानी हो और लग रहा हो कि मैं खुद अपने दरवाजे अपनी भावी पर्याय की अगवानी कर रहा हूँ, वो शगुन है।

कोई एक क्षण के लिए महा शक्ति आपके लिए मिले ये शगुन है
महाराज श्री ने कहा की कोई एक क्षण के लिए महाशक्ति जब निकलती है और दरवाजे पर कोई शगुन के रूप में साधु होता है तो उस शक्ति की एनर्जी उसको ऐसे ही ग्रहण हो जाता है जैसे दुनिया में वेबस फैली है लेकिन जो मोबाइल का नम्बर लगा कि सीधे उसी को ग्रहण हो जाती है।जब आप किसी भी कार्य मे कर्तव्य विमूढ़ हो जाओ, तुम इधर उधर देखने लग जाओ, समझ जाना तुम्हारे अंदर की आत्मा बोल रही है घबराओ मत, दुनिया मे कोई एक ऐसी शक्ति है जो तुम्हे इसका जबाब दे देगी।

 

 

 

कभी मन में आप हताश हो जाये, कोई भी रास्ता आपको नही सूझ रहा है और तुम्हारा मन भी कह रहा है कि मुझे इस कार्य मे सफलता नही मिलेगी, तुम थोड़ा आँख खोलकर चारो तरफ जरूर देखना, घर से निकलकर बाहर जरूर जाना, शायद कोई शगुन मिल जाये जो तुम्हे मंजिल तक पहुँचा देगा।

हमारे सामने सर्वज्ञ नही है कि हमारा अतीत कैसा था और हमें घोषणा करना है कि हमारा अतीत कैसा था, अपनी वर्तमान पर्याय को भूल जाओ और वर्तमान पर्याय में ये अनुभूति आ जाये कि मेरा अतीत बहुत अच्छा था, मेरा भविष्य बहुत अच्छा है क्योंकि आज मैं अच्छा हूँ। वर्तमान को दर्पण बना लो और अतीत में चले जाओ, वही झलकेगा वो सर्वज्ञ भगवान के ज्ञान में झलकता है, इसी का नाम है धर्मात्मा।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *