नौकर के हाथ की रोटी आज बच्चों का विनाश कर रही है : निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज
15 मई 2025, गुरुवार• , मझौली जबलपुर मध्यप्रदेश
परम पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव 108श्री सुधासागर महाराज ने प्रवचन देते हुए कहा की प्रकृति भी एक माँ है प्रत्येक वस्तु की एक नियत व्यवस्था करके भेजती है, यदि कोई कुछ भी न करें तो भी वस्तु स्वभाविक रूप से परिणमन करती है, उससे जिंदगी का गुजारा तो चल जाता है लेकिन नियत प्रकृति ने जो हमें जिंदगी दी है, उसी में सन्तुष्ट नहीं रहना है।
उन्होंने कहा जो माँ बाप हमें वसीयत छोड़ गए हैं, उसी वसीयत के भरोसे नहीं रहना है। पराई सम्पत्ति या अपने पिता की वसीयत पर जो नियत रखता है और उसी को अपनी जिंदगी का सम्पूर्ण मान लेता है, उसी का नाम पशु है। तीन चीजों के ऊपर जिंदगी नहीं जीना है- दूसरे की संपत्ति पर तो कभी जिन्दगी जीना ही नहीं। जो दूसरे की संपत्ति पर नियत रखता है वह तो आतंकवादी है, वो रावण है, पापी है। जब जब तुम्हारा दूसरे की संपत्ति पर मन जाए, समझ लेना तुम संसार के सबसे बड़े पापी निकृष्ट हो और तुम्हारी दुर्गति निश्चित है।


उन्होंने कहा जो वस्तु हमारी थी नहीं, है नहीं, होगी नहीं उस पर हम अपनी कभी नियत खराब नहीं करेंगे। आज यह नियम लेना है और यदि यह नियम नहीं है तो आप किसी भी कुल और जाति में जन्मों अपने आपको रावण मानना, आपकी गति वही होगी, जो रावण की होगी। सबसे ज्यादा पाप का बंध व्यक्ति इसी चीज से करता है।

उन्होंने कहा दूसरी बात वस्तु मेरी है नहीं लेकिन मैं उसे हांसिल कर सकता हूँ। कानून, श्रद्धा भाव से मेरी नहीं है और वह मेरी होना भी नही चाहती लेकिन मेरे में बल है मैं उसको अपनी कर सकता हूँ, इसे बोलते है डाकू। अपन को डाकू नही बनना, मेरे में समर्थ है लूटने का लेकिन नहीं लुटूँगा। महावीर ने सबसे पहले दूसरा नियम दिया कि पर वस्तु को लूट सकते हो लेकिन त्याग करो, मैं किसी की जायदाद नहीं हड़पूंगा, मैं अपने कब्जे में नहीं लूँगा और लेने का विचार भी नहीं करूंगा। तीसरी बात- यदि कोई पराई वस्तु है और वह मुझे खुशी-खुशी मिल रही है तो भी वह वस्तु यदि अनैतिक है,कानून-समाज-धर्म विरुद्ध है, हम वह वस्तु नहीं लेंगे।
कोई मुझे फ्री में शराब पिला रहा है, गुटखा ,मांस खिला रहा है, कोई पराई स्त्री तुम्हे खुशी खुशी चाह रही है लेकिन वह वस्तु असेवनीय है तो भी उसको ग्रहण नहीं करना। चौथा नियम है हम उस वस्तु को ग्रहण कर सकते है लेकिन हमें अनैतिकता पर उतरना पड़ेगा। सेवन, ग्रहण करने योग्य है लेकिन उसको पाने के लिए हमें अपने जीवन को कलंकित करना पड़ेगा, हम धर्म से छूट जायेंगे, वंछित हो जायेंगे और अपने लोग दुःखी हो जायेंगे।
उन्होंने इस बात पर भी ध्यान आकृष्ट किया की जो बालक पढ़ाई करते समय कैटरर्स का भोजन करें, वह बालक स्व घाती, कुल घाती, जात घाती, कुलघाती, धर्मघाती, माँ बाप घाती है, घाती अर्थात विपरीत चलने वाला, वो कुल में कलंक लगाएगा, अपनी जिंदगी को कलंकित करेगा, जाति को कलंकित करेगा, एक दिन माँ बाप की भी फिक्र करना छोड़ देगा क्योंकि उसने होस्टल में खाया नौकरों के, कैटर्स के हाथ का और होटलों में जाकर रहा है। जो बच्चे हॉस्टलों में पढ़े हो और शुरू से नौकरों के हाथ की रोटी खाई हो, उन बच्चों से आप अपनी जिंदगी की कोई उम्मीद मत रखना कि ये बुढ़ापे में काम आ जाएगा। उम्मीद मत करना कि यह कुल की लाज रखेगा, उम्मीद मत करना कि यह इज्जत के साथ जी पाएगा। उम्मीद मत करना कि यह जैन है, जैन ही बना रहेगा। नौकर के हाथ की रोटी आज बच्चों का विनाश कर रही है।
शिक्षक और गुरु में अंतर होता है, शिक्षक वह होता है जो वो जानता है, वह देता है और गुरु वह होता है जो स्वयं होता है, वही शिष्य को बना लेता है। शिक्षक मजदूर कहलाता है, वो पढ़ाने के लिए नहीं, रोटी रोजी कमाने के लिए पढ़ाता है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

