अरुचि एक ऐसी भावनात्मक दुर्बलता है जो हमें लौकिक और पारमार्थिक दोनों क्षेत्रों मे कमजोर बना देती हैं प्रमाण सागर महाराज
भोपाल
“अरुचि एक ऐसी भावनात्मक दुर्बलता है जो हमें लौकिक और पारमार्थिक दोनों क्षेत्रों में कमजोर बना देती है उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने अवधपुरी में व्यक्त किये।
प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताते हुये कहा कि मुनि श्री ने नकारात्मक शव्दों में से आज “अरुचि” शब्द पर व्याख्यान देते हुये अरुचि के स्वरूप उसके कारण तथा परिणाम को समझते हुए
उसके समाधान का रास्ता बताते हुये कहा कि “जहां मन है वहा काम नहीं जहां काम है वहा मन नहीं” कोई काम है तो उसमें मन नहीं लग रहा है और जहा मन है वहां कोई काम ही नहीं है
यह सभी अरुचि के लक्षण है हर व्यक्ति के जीवन में ऐसे
कार्य होते हैं जो बड़े रुचि पूर्वक करते हैं,तथा कुछ कार्य ऐसे होते हैं जो मन मार करके करते हैं। प्राय लोगों को लौकिक कार्यों में तो रुचि दिखती है,लेकिन धार्मिक कार्यों में
उनको ठेल ठेल कर भेजना पड़ता है, मुनि श्री ने कहा किसी भी क्षेत्र में आपके अंदर उत्साह कायम रहना चाहिए, अंदर की रुचि जब जगती है तो कोई भी काम हमारे लिए सहज हो जाता है और रुचि नहीं है तो वही कार्य भार हो जाता है, हम लोग प्रवचन करतेरुचि पूर्वक करते है, तो हमारे लिए सहज है और वही काम भार दिखने लगे तो समझ लेना अरुचि है।

मुनि श्री ने कहा कि जो भी काम करो रुचि पूर्वक करोगे तो भार भी सहज हो जाएगा और अरुचि होगी तो सहज काम भी भार बन जाएगा अंदर से सहज स्वीकृति का भाव होना चाहिए
“अरुचि” में आनंद नहीं अरुचि जीवन को बोझिल बनाती है और रुचि जीवन को भार मुक्त करती है अरुचि का तीसरा कारण है मन का अन्य विषयों में उलझ जाना मुनि श्री ने कहा कि जो हमारा लक्ष्य है उससे हट के जिसको आप दूसरे शब्दों में कहते”डिस्ट्रक्शन” जिन विषयों में है वो कार्य के बीच में रुकावट बनेंगे आप बैठे हैं पढ़ने के लिए बाजू में मोबाइल है और थोड़ा सा उसको देख ले फिर आपका मन पढ़ाई में लगेगा क्या? देखतेदेखते एक रील के बाद दूसरे तीसरे और सब समय रील ही चला जाता है,और रियल हाथ से निकल जाता है, अरुचि केवल कार्यों के प्रति नहीं स्वयं के प्रति भी होती है, आत्मा की उपेक्षा से व्यक्ति अपनी तरफ नहीं देखता औरों की तरफ देखना शुरू कर देता है और उधर इधर उधर देखते देखते उसका चित्त सदैव उलझा रहता है।

मुनि श्री ने कहा कि इन कारणों से हम बचे तभी हम अरुचि के परिणामों से बच पाएंगे बिना रुचि के कार्य की गुणवत्ता नहीं हो सकती आधे अधूरे मन से चाहे तुम काम करो चाहे पढ़ाई करो चाहे धंधा करो चाहे साधना करो वह अच्छे नहीं होंगे एवरेज भले हो जाए।



संत कहते है जिस भाव से जो कार्य तुम कर रहे हो उसमें डूब करके करो लीन होकर काम करोगे तो उसका अंजाम भी वैसा ही होगा मन लगाकर पढ़ो मन लगाकर काम करो मन लगाकर धंधा करो मन लगाकर ध्यान करो सब जगह मन लगाओ और मन कब लगेगा जिसमें आपको लाभ और आनंद की अनुभूति होगी मुनि श्री ने कहा कि कर्म को अपनी पूजा मानकर उसमें आनंद लीजिए आपकी रुचि हमेशा बनी रहेगी, अरुचि से कार्य करेंगे तो कार्य की गुणवत्ता अच्छी नहीं होगी रुचि नहीं रहेगी तो आपके सारे संबंध खत्म हो जाएंगे और संबंधों में कमी हो जाएगी और जीवन बोझिल बन जाता है संबंधों से अपने आप को काटो मत संबंधों से अपने आप को जोड़कर रखना, जिनकी अरुचि रहती है उनके मन में असंतोष होगा क्योंकि उनके अंदर शिकायतें बढ़ती है वह उत्साहीन हो जाता है,और उसका जीवन बोझिल बन जाता है वह ऊर्जा से शून्य हो जाता है इसलिए जो कार्य करना है रुचि पूर्वक करो संत कहते हैं अरुचि पूर्वक जीना यानी बिना प्राण के जीना।
मुनि श्री ने अरुचि को रुचि में परिवर्तित करते हुये कहा कि कोई भी काम करो तो उसे अपने हित से जोड़ो
मेरा काम है मुझे ही करना है एक विद्यार्थी अध्ययन को अपना धर्म माने एक गृहणी घर के कार्य को अपना कर्तव्य माने, एक व्यापारी अपने व्यापार को अपना कर्तव्य माने, एक साधक अपनी साधना को अपना
कर्तव्य माने, उसमें अपनी हित बुद्धि जगाकर के रखे तो स्वाभाविक तौर पर रुचि होगी पढ़ना पड़ रहा है? काम करना पड़ रहा है? धंधा करना पड़ रहा है? साधना करनी पड़ रही है? इसमें रुचि नहीं मजबूरी दिख रही है! मुनि श्री ने कहा कि जब अरुचि होने लगे घबराइए मत थोड़ा थोड़ा रोज रोज अभ्यास करें मुझे यह कार्य करना है ये कार्य करना है ये कार्य करना है यह भाव अंतर मन में जग जाएगा तो आपकी अरुचि रुचि में परिवर्तित हो सकती है जैसे एक बच्चे के मन में है एक विद्यार्थी के मन में पढ़ाई से रुचि कम हो रही तो उठे आंखें मूंदे भगवान को याद करें हे प्रभु मैं मुझे ऐसी दृष्टि दो कि मैं रुचि पूर्वक पढ़ सकूं मैं लगन से पढ़ सकूं मेरी पढ़ाई में रुचि जागृत हो सके यह प्रार्थना बार-बार दोहराओ
आजकल होता उल्टा है अच्छे कार्यों में अरुचि और बुरे कार्यों में रुचि बस इसे ही पलटना है उन्होंने अपना उदाहरण दिया कि मेरी सिद्धांत ग्रंथों में बड़ी रुचि थी लेकिन साहित्य और व्याकरण में मेरी रुचि नहीं थी गुरुदेव ने मुझसे कई बार बोला कि तुम साहित्य पढ़ो मैंने कहा गुरुदेव मेरा मन सिद्धांत का है सिद्धांत में मेरी रुचि है साहित्य में बाद में देखूंगा गुरुदेव आप तो मुझे सिद्धांत का आशीर्वाद दो और मैंने षठखंडागम और कषाय पाहुड के पूरे भागों के अध्ययन का संकल्प लिया मेरी रुचि थी तो मैंने षठखंडागम और धवला की 16 पुस्तक महाधवला और जय धवला की 16 पुस्तक अच्छे से लगन पूर्वक पढ़ लिया और उस पर अधिकार भी प्राप्त कर लिया लेकिन साहित्य और व्याकरण के प्रति जो अरुचि थी मैंने उसमें अनुत्साह प्रकट किया तो इसमें पिछड़ गया औरकच्चा रह गया अगर गुरुदेव की बात मान ली होती तो सिद्धांत के साथ साहित्य और व्याकरण के क्षेत्र
में भी मैं वैसा ही अधिकार प्राप्त कर लेता।
अविनाश जैन विद्यावाणी से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
