जैन संस्कृति कहती है कि प्रत्येक आत्मा में परमात्मा बनने की शक्ति है प्रमाण सागर महाराज

धर्म

जैन संस्कृति कहती है कि प्रत्येक आत्मा में परमात्मा बनने की शक्ति है प्रमाण सागर महाराज
भोपाल
“भारतीय संस्कृति बहुत महान संस्कृति है,जो हर आत्मा में परमात्मा होंने की बात करती है,वही जैन संस्कृति कहती है,कि प्रत्येक “आत्मा में परमात्मा बनने की शक्ति है।उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने रविवार को संवत्सर 2082 “नववर्ष” को बच्चो में “जैनत्व” के संस्कार देते हुये श्री नंदीश्वर जिनालय जैन नगर लालघाटी भोपाल में व्यक्त किये

 

मुनि श्री ने चार बाते प्रकृति, विकृति,अपसंस्कृति, और संस्कृति की बात करते हुये कहा कि अच्छा प्रयोग का हमेशा अच्छा परिणाम मिलता है,तथा गलत प्रयोग के दुष्परिणाम सामने आते है, मुनि श्री ने कहा कि हमारी संस्कृति कहती है कि “मनुष्य जीवन बहूत दुर्लभ जीवन है जहा थोड़े से संस्कार से “नर से नारायण” और अपसंस्कृति से नर से नारकी बन जाते है,आजकल का कल्चर संस्कृति के स्थान पर विक्रति और अपसंस्कृति ले चुकी है।

 

उन्होंने कहाआदमी का चित्र है तो बहुत खूबसूरत,पर इसे ठीक से समझने की है जरुरत, समझ गये तो भगवान की मूरत है,नहीं समझे तो यह शैतान की सूरत है” उन्होंने शिक्षा देते हुये कहा आपके पास एक कागज है तथा साथ में पेन भी है उस कागज पर आप सुंदर चित्र भी बना सकते हो और दाग धब्बे लगाकर गंदा भी कर सकते हो?ऐसे ही आप सभी का जीवन इस कोरे कागज के समान है इसे चरित्र के माध्यम से पूज्य भी बना सकते हो तथा गंदे आचरण से इसे गंदा भी कर सकते है,जेसे चित्र बनाने के लिये स्केल और नियंत्रण की जरुरत पड़ती है,उसी प्रकार चरित्र बनाने के लिये जीवन में डिसीप्लीन की जरुरत होती है जिसका चारित्र सुंदर है,उसका जीवन पूज्य बन जाता है, लेकिन आजकल पश्चिमी सभ्यता का इतना अधिक अंधानुकरण कर रहे हो कि अपनी हर भारतीय अपनी संस्कृति को भूल पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण में लग गया है। नववर्ष को छोड़कर हैप्पी न्यू इयर मनाने में लगा है आज स्थिति यह है कि बच्चों को तो छोड़ो बच्चों के पापा को भी हिंदी माह और विक्रम सम्वत की जानकारी नहीं है, लोग अंग्रेजियत के इतने गुलाम हो चुके है,कि अपनी सांस्कृतिक निष्ठा औरअपनी मूल पहचान को ही खो चुके है,उन्होंने समझाइश देते हुये कहा कि प्रत्येक नागरिक को चाहिये कि वह भारतीय भाषा का सम्मान करे अपने घर परिवार में सिर्फ मात्र भाषा का ही उपयोग करें।जहा आवश्यक है वही दूसरी अन्य भाषा को बोलें।

 

उन्होंने कहा कि अपने आपको सुपर साबित करने के चक्कर में हालत यह है कि कुछ लोग जो अपने आपको उच्च सोसायटी का मानते है हम लोगों के पास भी अपने बच्चों को लाते है और “लेग टच” करने को कहते है सोचिये आपके संस्कार कहा जीवित रहेंगे? मुनि श्री ने कहा कि पहले की अदालतों में जैनियों को शपथ नहीं दिलाई जाती थी यदि किसी जैन ने अदालत में गवाही दे दी तो जज उसी गवाह को सत्य मान लेते थे! आज हम लोग अपनी पहचान को खो चुके है,अपनी पहचान को कायम रखने के लिये हमें अपनी भाषा भूषा के साथ खानपान का भी ध्यान रखना होगा तभी हम पाषाण से भगवान बनने की कला सीख सकते है”नदी के किनारे एक छोटी सी चट्टान थी लोग आकर उस पर बैठते और अटखेलियाँ करते,कभी कभी धोबी आता और उस चट्टान पर अपने कपड़े पछाड़ता था एक दिन उधर से किसी शिल्पी का गुजरना हुआ और उसकी नजर उस पत्थर पर पड़ी उसने उस पत्थर को वहा से निकाला और अपने घर ले आया तथा उसे छैनी हथोड़ा से तराशा देखते ही देखते वह साधारण सा पत्थर एक भगवान की मूर्ति में तब्दील हो गया” सबसे पहले उस शिल्पी ने उस मूर्ति को प्रणाम किया।

 

उन्होंने सभी छोटे बच्चों को आशीर्वाद देते हुये कहा कि आज के यह छोटे बच्चे ही भारत की तकदीर है इन बच्चों से ही धर्मरथ आगे बढ़ेगा, इनके भविष्य को गढ़ने के लिये ही आज यहा पर प्रमाणिक पाठशाला का कलश स्थापित किया जा रहा है।आप सभी अभिभावकों का कर्तव्य है अपने इन बच्चों को प्रोत्साहित करें और नियमित पाठशाला में भेजकर सु संस्कारित करें।

इस अवसर पर मुनि श्री निर्वेगसागर जी मुनि श्री संधान सागर जी, मुनि श्री प्रवर सागर जी महाराज सहित समस्त क्षुल्लक महाराज मंचासीन थे।संघ के प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया मुनि श्री ने प्रातःकाल 26 बच्चों को जैनत्व के संस्कार दिये सभी बच्चों ने भगवान का अभिषेक एवं शांतिधारा कर मुनि श्री के हाथों से संस्कार विधी को संपन्न कराया।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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