अनादी काल से जीव परिग्रह के कारण दुखी है कनकनन्दी गुरुदेव

धर्म

अनादी काल से जीव परिग्रह के कारण दुखी है कनकनन्दी गुरुदेव

 

 

भीलूड़ा

कलिकाल समंतभद्र आचार्य
कनकनंदी गुरुदेव ने अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि अनादि काल से जीव परिग्रह के कारण दुखी है। चारों गतियों में अनंत दुख सहन कर रहा है। शत्रु, मित्र, भाई, बहन, पति, पत्नी ,बेटा, बेटी, पाप सब परिग्रह हैं। जो धन संपत्ति गाड़ी आदि नहीं है उनके प्रति भी संकल्प करना परिग्रह हैं। भूतकाल में मरे हुए पति, पत्नी, बेटा, बेटी , मरे हुए जीवो के प्रति मोह रखना भूत परिग्रह हैं। मैं मेरी भावी पोते पोतियो को पढ़ाऊंगा, खिलाऊंगा ऐसे विचार करना भावी संचित परिग्रह हैं। मेरा शत्रु, मेरा कुत्ता, मेरी गाय आदि संकल्प भी परिग्रह हैं। अचित्त परिग्रह के लिए सचित्त परिग्रह भाई बंधु आदि को मार देते हैं। सर्वज्ञ द्वारा प्रतिपादित वैश्विक सिद्धांत आचार्य श्री बता रहे हैं। अनेक राजाओं ने राज्य संपदा के लिए अपने पिता को बंदी बनाया कष्ट दिया। सचित्त, अचित्त, मिश्र परिग्रह सब में हिंसा हैं। एक परमाणु के प्रति भी मोह रखना परिग्रह है। ज्ञान उपकरण के रूप में पेन, जिनवाणी का प्रयोग,रखना परिग्रह नहीं हैं। कोई भी तीर्थंकर रुखा सुखा भोजन नहीं करते हैं। आदिनाथ भगवान ने इक्षु रस का भोजन तथा 22 तीर्थंकरों ने दूध की खीर का आहार लिया

 

 

चन्दना का उदाहरण दिया
उन्होंने कहा महावीर भगवान को चंदना रुखा सुखा भोजन भी भाव से देना चाह रही थी। परंतु पुण्य से वह सुरस भोजन बन गया। शरीर माध्यम खलु धम्मो शरीर ही धर्म का माध्यम है। इसलिए आचार्य श्री भी उत्तम भोजन करते हैं। धर्म में जिनवाणी के प्रकाशन को धन का दुरुपयोग मानना जिनवाणी का अपमान हैं,मिथ्यात्व हैं जिनवाणी के माध्यम से ही हमें ज्ञान हो रहा है। आगम के कठिन उच्च सिद्धांतों को आचार्य श्री सरलीकरण करके लिखते हैं यह आने वाली पीढ़ी के लिए उपकार है। ग्रंथ उपकरण है। धर्म ग्रंथ होने से ही यह धर्म अविरल चला आ रहा है। शास्त्र हमारे पास सतत रह सकते हैं। गुरु तथा जिन मूर्ति हमेशा पास नहीं रख सकते अभी हमारे पास लगभग दो हजार तीन हजार वर्षों पुराना आगम है। इसके माध्यम से ही शांति सागर जी गुरुदेव ने मुनि दीक्षा धारण की और यह जाना कि पंचम काल के अंतिम तक साधु रहेंगे। मूर्ति बेचने वाला भी परिग्रही है। सामने वाले के अभिप्राय के अनुसार एक ही वस्तु एक व्यक्ति के लिए परिग्रह एक व्यक्ति के लिए अपरिग्रह हो सकता है। एक ही वस्तु अनेक लोगों के लिए भी परिग्रह हो सकती है। आचार्य श्री के शिष्य श्रीपाल , टीना, हितेश , सुरुचि, पंडित पंकज, कीर्ति मुंबई से सभी ने अपने अनुभव बताएं

विजय लक्ष्मी गोदावत से प्राप्त जानकारी के साथ
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमडी

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