मन के मालिक बनो गुलाम नहीं बनवाने की प्रवृत्ति इंसान को दुखी करती है प्रमाण सागर महाराज
भोपाल
“मन के मालिक बनो गुलाम नहीं,मनवाने की प्रवृति इंसान को दुखी करती है” उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने नंदीश्वर जिनालय जैन नगर लालघाटी भोपाल में प्रातःकालीन धर्मसभा में व्यक्त किये।
मुनि श्री ने कहा कि”मन” का काम है मनमानी करना और हम सभी मन के दास बने हुये है,मन की मानते आ रहे है, इसलिये दुःखी है जितनी चाह उतनी दाह और दाह में राह कहा?आचार्य गुरुदेव ने एक हायकू लिखा है “मन” का काम मन से नहीं मन से काम लो मोक्ष का”
मुनि श्री ने कहा कि भोग विलासिता,धन बैभव तथा
विषयों की यह अंतहीन चाह है,जो पल पल बदलती है,कभी पूर्ण होंने वाली नहीं, एक इच्छा पूर्ण होती है कि दूसरी इच्छा तुरंत अपना स्थान बना लेती है,और इच्छाओं का यह अंतहीन सिलसिला कभी समाप्त होंने बाला नहीं, मुनि श्री ने कहा कि “मन” का काम है दौड़ना और दौड़ाना यदि आप मन की ही मानते रहोगे तो भटक जाओगे,मन को मनाने का उपाय बताते हुये कहा कि सबसे पहले अपनी आंतरिक चेतना को जगाइये,हिताहित का विवेक और ज्ञान से मन का समाधान संभव है, मुनि श्री ने कहा कि “मन” चाहे आपका हो या किसी दूसरे का तोड़ना तो कभी नही चाहिये यदि अपने मन को तोड़ा तो आप डिप्रेशन में आ सकते हो और दूसरे का मन तोड़ा तो वह दुखी हो जाएगा।

मुनि श्री ने कहा कि न तो कभी किसी से ऐसे शब्द कहो और न किसी के साथ ऐसा व्यवहार करो कि उसका मन टूट जाए, क्योंकि यदि “व्यक्ति की कमर टूट जाऐ तो वह फिर भी खड़ा हो सकता है,लेकिन मन टूट जाए तो उसको खड़ा कर पाना बहूत मुश्किल है” किसी का मन तोड़ना भी एक प्रकार की हिंसा है, न अपने मन को तोड़ो न किसी दूसरे के मन को तोड़ो सबके मन को जोड़ो तथा मन को मनाने की कला यदि सभी प्राप्त कर लें तो हमारा जीवन धन्य हो जाएगा

उन्होंने कहा कि भोगों से हटकर मन को प्रभु से जोड़ लो और वस्तु स्वरूप तथा तत्वज्ञान से इस मन को मोड़ा जा सकता है।मुनि श्री ने कहा कि सच्चे अर्थों में देखा जाए तो हमारी साधना भी हमारे मन पर ही आधारित है।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

