तीर्थंकर ऋषभदेव भारतीय संस्कृति के आद्य प्रणेता माने जाते हैं। विमल सागर जी

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तीर्थंकर ऋषभदेव भारतीय संस्कृति के आद्य प्रणेता माने जाते हैं। विमल सागर जी

शाहगढ़

शनिवार की पावन बेला मे भगवान ऋषभदेव जन्म जयंती महोत्सव पर प्रकाश डालते हुए कहा कीतीर्थंकर ऋषभदेव भारतीय संस्कृति के आद्य प्रणेता माने जाते हैं। वेदों, उपनिषदों और पुराणों में समागत उनके उल्लेख यह कहने के लिए पर्याप्त हैं कि ऐसे महापुरुष थे जिन्होंने मानव समुदाय को कृषि, लेखन, व्यापार, शिल्प, युद्ध और विद्या की शिक्षा दी। उनकी शिक्षाएं आज अधिक प्रासंगिक हैं। उनका एक प्रमुख संदेश था कृषि करो या ऋषि बनो। उन्होंने मानव जाति को पुरुषार्थ (कर्म) का उपदेश दिया। मुनिश्री ने कहा कि लेखन कला और ब्राह्मीलिपि का आविष्कार तीर्थंकर ऋषभदेव ने किया था। विभिन्न साक्ष्यों द्वारा यह पुष्टि हुई है। मानवीय गुणों के विकास की सभी सीमाएं भगवान ऋषभदेव ने उदघाटित कीं।

ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र भरत के नाम से इस देश का नामकरण ‘भारतवर्ष है

मुनि श्री ने बताते हुए कहा इन्हीं प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र भरत के नाम से इस देश का नामकरण ‘भारतवर्ष’ इन्हीं की प्रसिद्धि के कारण विख्यात हुआ यह ऐतिहासिक तथ्यों से प्रमाणित है। भगवान ऋषभदेव द्वारा बताई गई जीवन शैली की हमारी सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक व्यवस्था में काफी प्रासंगिकता एवं महत्ता है। उनके द्वारा प्रतिपादित ज्ञान-विज्ञान की विभिन्न क्षेत्रों में ऐसी झलकियां मिलती हैं जिन्हें रेखांकित करके हम अपने सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन की गुणवत्ता को बढ़ा सकते हैं। भगवान ऋषभदेव ने महिला साक्षरता तथा स्त्री समानता पर भी महत्वपूर्ण कार्य किया है।
संकलित अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमंडी

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