अनुपम कृति है मूक माटी विद्वत संगोष्ठी का भव्य शुभारंभ

धर्म

अनुपम कृति है मूक माटी विद्वत संगोष्ठी का भव्य शुभारंभ

सतना!
श्री दिगंबर जैन समाज सतना द्वारा आयोजित मूक माटी महाकाव्य एवं चंपू काव्यम पर आयोजित द्विदिवसीय विद्वत संगोष्ठी का शुभारंभ परम पूज्य आचार्य 108 श्री समय सागर जी महामुनिराज के ससंघ सानिध्य में 11 जनवरी 25 को प्रात: 8:00 बजे से स्थानीय विद्या सभागार, पुराना पावर हाउस मैदान में हुआ! प्रथम सत्र प्रातः8:00 बजे से प्रारंभ हुआ! जिसके मुख्य अतिथि श्री सुरेंद्र सिंह गहरवार विधायक चित्रकूट विधानसभा एवं विशिष्ट अतिथि डॉ भरत मिश्रा कुलपति चित्रकूट विश्वविद्यालय, डॉ हर्षवर्धन श्रीवास्तव प्रतिकूलपति रहे!कार्यक्रम का प्रारंभ मंगलाचरण के साथसंपन्न हुआ! मंगलाचरण अर्हम प्राकृत पाठशाला सतना की श्रीमती स्वाति जैन, रेशमा जैन,रजनी जैन द्वारा किया गया!

 

आचार्य भगवान के चित्र का अनावरण एवं दीप प्रज्वलन बाहर से पधारे हुए विद्वानोंके द्वारा संपन्न हुआ! मंगल कलश स्थापना करने का सौभाग्य श्री विजय कुमार जैन महावीर ज्वेलर्स परिवार को प्राप्त हुआ! प्रथम सत्र का संचालन डॉ सोनल कुमार दिल्ली के द्वारा किया गया! प्रथम सत्र की अध्यक्षता डॉ प्रोफेसर जयकुमार जी के द्वारा की गई!आमंत्रित विद्वानों का सम्मान श्री महावीर दिगंबर जैन परमार्थिक संस्था के द्वारा किया गया !

 

प्रथम सत्र के प्रथम वक्ता के रूप में प्रोफेसर श्रेयांश प्रसाद जी ने मूक माटी के संस्कृत संस्करण मूक मृतिका पर अपना उद्बोधन देते हुए कहा कि कुछ ऐसे व्यक्तित्व होते हैं, जो अक्षर बन जाते हैं! लाखों वर्षों तक उन्हें याद किया जाता रहता है! आचार्य विद्यासागर जी एवं उनकी कृति मूक माटी को भी लाखों वर्षों तक याद किया जाता रहेगा! आचार्य श्री अनेक विशेष गुणों से युक्त है! यह कृति उसी का प्रतिरूप है!यह कृति समाज और राष्ट्र की निधि है! प्रोफेसर राजेंद्र मिश्रा ने मूक माटी का संस्कृत अनुवाद किया है! जो चार खण्डों में विभक्त है!दया को धर्म का मूल कहा गया है !दया ही शरण है, अन्य कोई शरण नहीं है! परस्परोप ग्रहो जीवनाम इस सूक्ति को भी आचार्य श्री जी ने इस कविता मे वर्णित किया है तन और मन को तप कर शुद्ध करना होगा! तभी आत्मविशुद्ध होगी!मूक माटी ग्रंथ में साधुओं की के जीवन चर्या पर चर्चा करते हुए साधुओं को बहुत सौम्य रूप में अंकित किया है!

द्वितीय वक्ता आशीष जैन ने बताया कि मूक माटी में ढाई सौ से अधिक सूक्तियां है!इसमें आचार्य श्री कहते हैं सही अवधान नहीं हुआ तो सही समाधान भी नहीं होता! मूक माटी में सामाजिक, धार्मिक, आदि सभी बिंदु है !जिसकी जैसी संगति होती है वैसी उसकी मति होती है! और वैसी ही गति भी होती है !यदि हमने असत्य की पहचान कर ली तो सत्य की पहचान हो ही जाती है !हमें अपने जीवन की यात्रा शिखर से नहीं चरणों से प्रारंभ करनी चाहिए!एकांत धारणा से आध्यात्म की विराधना होती है! प्रोफेसर धर्मेंद्र कुमार जी ने कहा कि मूक माटी में संगति का जीवन में क्या प्रभाव होता है!औ रसामान्य जीवन की बातों को सुगमता से दर्शाया गया है!

 

 

प्रोफेसर राजेंद्र मिश्र जो की मूक माटीके संस्कृत संस्करण के अनुवादक है नेअपने भाव व्यक्त करते हुए कहा कि मैं एकलव्य की तरह आचार्य श्री का उपासक हूं! एकलव्य ने तो अंगूठे का दान देकर धनुर्विद्या को प्राप्त किया था! किंतु आचार्य की कृपा से मुझे बिना अंगूठा काटे उनका वात्सल्य मिलता रहा है !सत्य तो यह है कि मैंने मूक माटी का अनुवाद किया ही नहीं, अनुवाद भी आचार्य श्री ने किया, कृति भी आचार्य श्री थे ,कविता भी वही और कलम भी वही है!इस कृति की तुलना महा कवि प्रसाद की कामायनी से करते हुए मिश्रा ने कहा कि मूक माटी महाकाव्य कामायनी से कम नहीं है!
विद्वत संगोष्ठी मेंअवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय रीवा के कुलपति डॉ राजकुमार आचार्य ने अपने भाव व्यक्त करते हुए कहा कि कुछ वर्षों पूर्व मुझे आचार्य श्री के दर्शन का सानिध्य प्राप्त हुआ !तब मैंने आचार्य श्री से नई शिक्षा नीति के संबंध में चर्चा की तो आचार्य जी ने कहा शिक्षा में भारत को पढ़ाइए ! हमारे ज्ञान की श्रेष्ठता लौकिक है, किंतुआचार्य श्री जैसे जो संत हैं उनके इनका ज्ञान पारलौकिक है! हमारा ज्ञान आडंबर से ढका रहता है! इनका ज्ञान भक्तांबर युक्त है!उन्होंने आचार्य गुरुवर श्री समय सागर जी महाराज से आग्रह किया कि आपका आशीर्वाद से रीवा विश्वविद्यालय में होने वाला अरहम ध्यान योग के प्रकल्प संचालित है! उसका सेमिनार शीघ्र होने वाला है उसकी सफलता के लिए आपका आशीर्वाद चाहता हूं!

देश के अनेक विश्वविद्यालयके पाठ्यक्रम में संचालित है मूक माटी अभय सागर महाराज

 


निर्यापक श्रमणपूज्य मुनि श्री अभय सागर जी महाराज ने विद्वत गोष्ठी को संबोधित करते हुए मूक माटी के बारे में बताया कि 25 दिसंबर 1984 को लेखन का कार्य आचार्य श्री के द्वारा प्रारंभ हुआ था! 658 दिनों के पश्चात 11 फरवरी 1987 को मूक माटी का लेखन का समापन हुआ! मूक माटी पर 284 समीक्षाएं प्रकाशित हो चुके हैं! मूक माटी पर अनेकों शोध कार्य हो चुके हैं! 42 पी एच डी, 8 एम एम फिल 10 एम एड के लघु शोध प्रबंध,6 MA के लघु शोध प्रबंध मूक माटी पर हुए हैं! मध्य प्रदेश एवं प्रदेश के बाहर लगभग 50शासकीय विश्वविद्यालयों की पाठ्यक्रम में मूक माटी शामिल है!इसके अतिरिक्त32 निजी विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में भीयह शामिल है! मध्य प्रदेश राज्य शिक्षा बोर्ड ने कक्षा 9 में मूक माटी को सम्मिलित किया है!मूक माटी का अनुवाद अनेक भाषाओं में किया गया है !जिनमें हिंदी, संस्कृत, प्राकृत, कन्नड़ गुजराती,बांग्ला, मराठी, पंजाबी, असमिया, तमिल, अंग्रेजी आदि प्रमुख है! इसके अतिरिक्त जर्मन तथा जापानी भाषा में भी इसका अनुवाद हो चुका है!

 

 

उड़िया एवं उर्दू भाषा में इसके अनुवाद का कार्य चल रहा है!मूक माटी पर 110 चित्रों की एक कृति का प्रकाशन किया गया है! जो मूक माटी शतक के नाम से प्रसिद्ध है!विद्वत संगोष्ठी को संबोधित करते हुएआचार्य श्री समय सागर जी महाराज ने कहा की हम और आप आचार्य श्री जी की पूजन करते हैं!उनका व्यापक दृष्टिकोण है!और विनम्रता की दृष्टि से उनका वर्णन नहीं कर पाते हैं ! आचार्य श्री ने मूक माटी में हमे जीवन जीने की कला को पाते हैं! हमें चाहिए कि जिस प्रकार से मौन होकर माटी रौंदा जाती है! और संघर्षों को उपसर्गों को सहन कर के कलश के रूप में शिखर पर विराजमान होती है! उसी प्रकार हमें भी अपने जीवन में संघर्ष और विशुद्ध तप त्याग के माध्यम सेअपने जीवन को भी शिखर की ओर ले जाना है! हमें शिखर की यात्रा करनी है! धर्म साधना की वस्तु है, धर्म को भाषा में परिभाषित नहीं किया जा सकता है !इससे हमें स्वयं अपने अंदर महसूस करना होगा! विद्वत संगोष्ठी में श्री आनंद सोनी अध्यक्ष AKS विश्वविद्यालय डॉ आरके श्रीवास्तव ,डॉ आर एस त्रिपाठी, डॉ सुधीर जैन,सहित शहर केअनेक गणमान्य सुधी श्रोता उपस्थित रहे!जैन समाज के अध्यक्ष डॉ अरविंद सराफ एवं मंत्री अंशुल जैन ने विद्वत संगोष्ठी में आकर धर्म लाभ लेने की अपील की है!
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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