आचार्य सन्मति सागर तपस्या और त्याग का पर्याय आचार्य श्री सुनील सागर महाराज
मूंगाणा
आचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज ने तपस्वी सम्राट आचार्य श्री सन्मति सागर महाराज को समाधि दिवस पर भावभीनी विनयाजलि अर्पित करते हुए कहा कि 24 दिसंबर को आचार्य श्री सन्मति सागर महाराज का समाधि दिवस है। जो उनकी तपस्वी जीवन की महानता को स्मरण करने का अवसर है।
आचार्य श्री ने कहा कि आचार्य सन्मति सागर महाराज ने अपने जीवन में कठोर तप और वैराग्य को अपनाया। उन्होंने 1974 में नमक और अन्न का त्याग कर केवल उबले हुए केले और मट्ठे का आहार लेना शुरू किया। उनका उपवास और कठोर साधना इस बात का प्रमाण है कि आत्मा की शुद्धि और मोक्ष प्राप्ति के लिए जीवन में तपस्या का महत्व सर्वोपरि है।

उन्होंने कहा पत्ते गिर सकते हैं, मगर पेड़ नहीं गिरता है सूरज बदल सकता है मगर आसमान नही, दुनिया को भुलाया नहीं जा सकता है मगर गुरु को नहीं। उन्होंने कहा कि आचार्य श्री सन्मति सागर महाराज ने हमेशा आत्मा की शुद्धि पर ध्यान केंद्रित किया।
उनका मानना था कि शरीर का नहीं, आत्मा का श्रृंगार करना





चाहिए। जो आत्मा की सेवा करता है वह एक दिन परमात्मा को प्राप्त करता है। उन्होंने श्रद्धालुओं को कहा कि वे आचार्य सन्मति सागर महाराज के तप और वैराग्य से प्रेरणा लेकर अपने जीवन को आत्म सुधार की दिशा में मोडे। गुरु के बताए मार्ग पर चलकर ही मोक्ष की प्राप्ति संभव है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
