धूमधाम से संपन्न हुआ सिद्ध चक्र महामंडल विधान एवं पिछिका का परिवर्तन*भक्तो का उमड़ा जनसैलाव
*रजवांस।*
जैन समाज के लोगों के लिए बीते दिन आस्था, श्रद्धा और भक्ति से सराबोर रहा। आर्यिका माँ लक्ष्मी भूषण माताजी एवं रिम्मी दीदी जी के सानिध्य में और विधानाचार्य पं. सनत कुमार, विनोद कुमार के दिशा निर्देश में एवं प्रति प्रमोद जैन बिसराहा बालो के सानिध्य में जैन मंदिर परिसर में चल रहे श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान एवं विश्व शांति महायज्ञ में सुबह जिन श्री जी का अभिषेक, पूजन, विधान कर मंडल पर भजनो की स्वर लहरियों के बींच अर्घ चढ़ाए गये। और दोपहर में पिच्छिका परिवर्तन समारोह का आयोजन किया गया। इस मौके पर श्रावक श्राविकाओं ने पिच्छिका की शोभायात्रा निकाली जिसमें रथ पर सवार आदिकुमार एवं इंद्र इंद्राणिया आकर्षण का केंद्र रही। समाज के लोगों ने घर के सामने रंगोली बनाकर श्रीजी की आरती उतारी वही भक्तो ने भक्ति संगीत पर जमकर नृत्य किया। पिच्छिका को बडे़ आकर्षण ढंग से सजाया गया और उसको गाजे बाजों के साथ कार्यक्रम स्थल तक लाया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ मंगलाचरण कर किया। कार्यक्रम में आर्यिका माँ के परिजनों एवं
जगह जगह से पधारे भक्तों सहित समाज के लोगों ने अर्घ एवं श्रीफल अर्पित कर आशीर्वाद लिया।
*साधन से नहीं साधना से ही मुक्ति संभव- आर्यिका लक्ष्मी भूषण मति माताजी*

धर्म सभा को संबोधित करते हुए आर्यिकारत्न लक्ष्मी भूषण माताजी ने कहा कि साधन से नहीं साधना से ही मुक्ति मिल सकती है। संयम का प्रतीक है पिच्छी और पिच्छी साधु के संयम का उपकरण है। इसके पांच गुण होते हैं। साधु हमेशा अपने पास पिच्छी रखते हैं। संयम में सहायक होती है। पिच्छी आचरण-संयम में परिवर्तन का बोध कराती है। वहीं, आर्यिका मां न कहा कि जिस प्रकार पिच्छिका का परिवर्तन हो रहा है उसी प्रकार संसार भी परिवर्तनशील है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में मोक्ष मार्ग पर चलने के लिए जीवन में परिवर्तन लाना चाहिए।

*क्या है पिच्छिका, क्यो मोर पंख की बनी है*
दिगंबर साधु की पहचान मोर पंख की पिच्छी है। पिच्छी मोर द्वारा छोड़े गए पंखों से निर्मित है। यह इतनी मुलायम होती है कि इससे किसी जीव को हानि नहीं पहुंचती। संत की पिच्छी प्राप्त होना सौभाग्य की बात है। मोर ही अकेला एक ऐसा प्राणी है, जो ब्रह्मचर्य को धारण करता है। जब मोर प्रसन्न होता है तो वह अपने पंखो को फैला कर नाचता है और जब नाचते-नाचते मस्त हो जाता है, तो उसकी आंखों से आंसू गिरते हैं और मोरनी इन आंसू को पीती है
इससे ही गर्भ धारण करती है। मोर में कहीं भी वासना का लेश भी नहीं है। आर्यिका माँ लक्ष्मी भूषण मति माताजी ने कहा कि जिसके
जीवन में वासना नहीं, भगवान उसे अपने शीश पर धारण कर लेते हैं। कार्तिक मास में स्वयं ही मयूर अपने पंखों को छोड़ देते हैं, उन्हें
ही ग्रहण कर यह पिच्छिका बनाई जाती है। दीक्षा के समय आचार्य एवं आर्यिका इस संयम के उपकरण रूप पिच्छिका को जीव दया पालन हेतु शिष्यों को देते हैं। पिच्छिका में पांच गुण होते हैं। जिसमें धूलि को ग्रहण नहीं करना, पसीने से मलिन नहीं होना, मृदुता, सुकुमारता और लघुता शामिल हैं।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
