*पूर्वाचार्यो की दूरदृष्टिता,सटीक आकलन व वात्सल्य प्रोत्साहन से बने वर्तमान विश्व के दुर्लभ महाज्ञानी सन्त-*
सन 1979-80 कर्नाटक श्रवणबेलगोला का पावन दृश्य जब आगामी वर्ष 1981 में महामस्तकाभिषेक हेतु विश्व सन्त आचार्य श्री देशभूषण जी ऋषिवर व श्वेतपिच्छाचार्य श्री विद्यानन्दी जी गुरूराज के मुख्य निर्देशन सानिध्य,सर्वाधिक पद विहारी वात्सल्यरत्नाकर आचार्य श्री विमलसागर जी ऋषिराज व गणाधिपति गणधराचार्य श्री कुंथुसागर जी गुरूराज जैसे महासन्तो का सह सानिध्य था ऐसे में अनेकानेक सन्त संघ भी पूर्व से इस धरा पर पधार चुके थे।
यह भूमि 2200 वर्षो से दिगम्बर जैन सन्तो की प्रमुख रूप से साधना,सन्त समागम,स्वाध्याय व सामूहिक ज्ञानाभ्यास के लिए श्रेष्ठतम क्षेत्र रहा है। भारत का यह ऐसा तीर्थ है जहाँ पर 2200 वर्ष पूर्व अंतिम श्रुत केवली भद्रबाहु स्वामी व उनके सुशिष्य





अंतिम मुकुट बद्ध राजा सम्राट -मुनि श्री चन्द्रगुप्त मौर्य ने समाधि की महान साधना की। साथ ही विश्व सबसे खूबसूरत,अत्यंत विशाल जग अतिशय कारी 1000 वर्ष प्राचीन भगवान बाहुबली स्वामी की मनोहारी प्रातिमा है।जिन्हें गोम्म्टेश्वर बाहुबली कहा जाता है जिनका प्रत्येक 12 वर्ष में अंतराष्ट्रीय स्तर पर महामस्तकाभिषेक होता है कहते है देश का जो सर्वोच्च नेता इस महामहोत्सव में सम्मिलित होता है वो इतिहास के पन्नो में सर्वश्रेष्ठ मजबूत नेता के रूप में प्रसिद्धि को पाता है।
सन 1980 में एक वर्ष पूर्व से ही बड़े बड़े संघो का आगमन हो चुका था।चौबीसी जिनालय में सभी संघ सामूहिक रूप से मूल अत्यंत प्राचीन सिद्धान्त ग्रन्थों का स्वाध्याय, जिज्ञासा व समाधान करते थे।
उन सेकड़ौ सन्तो में गणधराचार्य श्री कुंथुसागर जी गुरूराज के संघस्थ क्षुल्लक जी थे,जिनका नाम था क्षुल्लक कनकनन्दी।
जिनकी जिज्ञासा,तर्क,स्वाध्याय के प्रति दृढ़ अनुशासन,विनय,बौद्विक क्षमता व ज्ञान पिपासा समस्त आचार्य व सन्तो का मन मोह लेती थी।
उनकी प्रत्येक जिज्ञासा,तर्क पर सभी गुरुजन विशेष टकटकी रखते थे। बड़े आचार्य उन्हें प्रश्न नन्दी,जिज्ञासा नन्दी,तर्क शिरोमणि नाम से भी सम्बोधित कर रहे थे।क्योंकि इस विलक्षण क्षमता से सबकों स्वाध्याय का
अद्वितीय आनन्द भी प्राप्त हो रहा था।
एक दिन क्षुल्लक श्री कनकनन्दी जी के घुटने पर चोट की वजह से पैर को मोड़ने में व बैठने में दिक्कत हो रही थी,पालती लगाकर नही बैठ पाते थे इसलिए वे सामूहिक स्वाध्याय में सबसे पीछे बैठे हुए थे।वरिष्ठ आचार्य श्री देशभूषण जी भगवन्त,वात्सल्यरत्नाकर स्वामी व श्वेतपिच्छाचार्य श्री विद्यानन्दी जी ने सबको पूछा कि हमारा जिज्ञासा नन्दी(कनकनन्दी) कहा है????गणधराचार्य श्री ने कहा कि पीछे अंतिम में बैठे है,इस पर आचार्यो ने कहा-क्यो क्षुल्लक जी आप पीछे बैठे है???
क्षुल्लक बोले-गुरुदेब घुटने में चोट की वजह से एक पैर फैलाकर बैठना पड़ रहा है,ऐसे में समस्त गुरुजनों के मध्य पैर फैलाकर नही बैठ सकता इसलिए अंतिम में बैठा हूँ जिससे किसी का अविनय न हो।
इस पर श्वेतपिच्छाचार्य श्री विद्यानन्दी जी तुरन्त बोले कि हम आज्ञा देते है कि क्षुल्लक जी आप आगे आकर हम सबके मध्य मे जिस घुटने पर चोट है उस पैर को फैलाकर बैठो,गुरु आज्ञा है तो कोई अविनय नही होता इसलिए आगे यहाँ मध्य में आओ तो ही हम सबको आपकी विलक्षण बौद्धिक क्षमता,सटीक सुंदर जिज्ञासाओं से स्वाधाय का अदभुद आनन्द प्राप्त होगा।
क्षुल्लक श्री कनकनन्दी जी हाथ जोड़कर पुनः पीछे बैठे रहने का ही निवेदन किया लेकिन फिर श्वेतपिच्छाचार्य श्री विद्यानन्दी जी गुरूराज की आज्ञा का अन्य सभी बड़े आचार्यो ने भी समर्थन किया
जिससे क्षुल्लक श्री कनकनन्दी जी जब तक चोट रही तब तक गुरुओ की आज्ञा से सबसे आगे मध्य में एक पैर आगे किये हुए बैठे व स्वाध्याय का सर्वोच्च तप उस धरा पर महकता रहा।
विश्व सन्त आचार्य श्री देशभूषण जी,वात्सल्यरत्नाकर आचार्य श्री विमलसागर जी,श्वेतपिच्छाचार्य श्री विद्यानन्दी जी,गणधराचार्य श्री कुंथुसागर जी,अभिक्षण ज्ञापयोगी आचार्य श्री अभिनन्दन सागर जी,मर्यादा शिष्योत्तम आचार्य श्री भरतसागर जी व प्रथम गणिनी आर्यिका श्री विजयमती माताजी जैसे धर्म के महान धुरंधरों ने कनकनन्दी जी की विलक्षण-अनूठी क्षमता को जानकर भविष्य में जैन दर्शन विज्ञान की विश्व व्यापी प्रभावना हेतु क्षुल्लक-मुनि पद से लेकर उपाध्याय व आचार्य पदवी तक शिक्षण,अध्यापन -लेखन हेतु वात्सल्य प्रोत्साहन व आज्ञा प्रदान की। उनकी अथाह योग्यता को देखकर आचार्य श्री कनकनन्दी जी को सिद्धांत चक्रवर्ती, कलिकाल अकलंक,वर्तमान समन्तभद्र के साथ साथ वैज्ञानिक धर्माचार्य की उपमाओं से अलंकृत किया।
पूर्वाचार्यो की अपेक्षाओं पर शत प्रतिशत खरे उतरते हुए वैज्ञानिक धर्माचार्य श्री कनकनन्दी जी गुरूराज अंतरंग तप व ज्ञान साधना की अथाह गहराई में रहते हुए देश-विदेश के अनेक अध्यात्म प्रेमी वैज्ञानिक,प्रोफेसरों,न्यायाधीश व चांसलरों को धर्म विज्ञान की शिक्षा देकर सात समंदर पार तक जैन धर्म के पूर्ण विज्ञान को विश्व तक पहुचाया।
इसीलिए अहिँसा मिशन फाउंडेश,jas जैसी अनेक उच्चशिक्षाविद व वैज्ञानिकों से भरी संस्थाओं ने उन्हें कलिकाल के श्रुत केवली उपमा प्रदान की है।
पूज्य आचार्य श्री कनकनन्दी जी मुनि दीक्षा काल से ही धर्म को विज्ञान के रूप में परिभाषित करते हुए भीड़ युक्त आयोजनों, पँचकल्याणको, बोलियों,प्रदर्शन,दिखावो व आडम्बरो से दृढ़ संकल्प पूर्वक दूर ही रहते है और विगत 25 वर्षों से मेवाड़ वागड के एकान्त छोटे छोटे गाँवो में विहार-प्रवास करते है।अंतराय कर्म से उनके शरीर पर पित्त व कफ का भारी प्रकोप व बदन में गर्मी का भयंकर प्रभाव रहता है लेकिन उपसर्ग विजयी की तरह समता भाव मे अनवरत ज्ञान-ध्यान साधना में रत रहते है।पूज्य आचार्य श्री जिस क्षेत्र में प्रवास करते है वहाँ समाज मे किसी तरह मन भेद,विवाद व कषाय स्वतः दूर रहती है,गुरुदेव ने 400 से अधिक ग्रन्थ,13000 काव्य लिखे है,1000 से अधिक वर्चुअल स्वाध्याय प्रवचन के वीडियो लेकिन आज तक किसी भी शब्द या वचन पर विवाद नही हुआ।
आप आत्म निर्मलता,निश्छलता, ज्ञानकोष,विलक्षणता,निराडम्बरता व सादगी की इस विश्व मे अनूठी अनुकरणीय मिसाल है।इसलिए आपको जैन दर्शन व अध्यात्म का जीवंत विश्व विद्यालय कहा जाता है जिनकी संगति से इस जग को डॉ राजमल,डॉ नारायण लाल कच्छारा,डॉ सुरेंद्र सिंह पोखरना,डॉ बीएल सेठी,डॉ सोहनलाल जी तातेड, प्रो टीकम चंद जी जैसे सेकड़ौ वैज्ञानिक व दार्शनिक विद्वान प्राप्त हुए है।
समस्त पूर्वाचार्यो को नमन करते हुए ऐसे ज्ञानबल धारी धर्म सूर्य वैज्ञानिक धर्माचार्य श्री कनकनन्दी जी गुरूराज के श्री चरणों मे अविनाशी नमन
*🖊️शब्दसुमन-शाह मधोक जैन चितरी🖊️*
