विश्व की पहली अष्ट धातु के 108 प्रतिमा युक्त 52 नन्दीश्वर चल चैत्यालय की प्रतिष्ठा कुन्डलपुर मे होने के बाद सकुशल आगरा पहुंचे सभी 52 चैत्यालय

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विश्व की पहली अष्ट धातु के 108 प्रतिमा युक्त 52 नन्दीश्वर चल चैत्यालय की प्रतिष्ठा कुन्डलपुर मे होने के बाद सकुशल आगरा पहुंचे सभी 52 चैत्यालय

 

विगत वर्ष पूज्य मुनिद्व्य प्रणम्यसागर जी व चन्द्रसागर जी महाराज के ऐतिहासिक आगरा वर्षायोग के समापन के बाद आगरा नगर मे पूज्य मुनिद्व्य के द्वारा नगर मेअनेक बडे बडे कार्य एवं कार्यक्रम करवाये गये, उन्ही मे से एक कार्यक्रम था कमलानगर आगरा मे आयोजित 10 दिवसिय नन्दीश्वर महामह विधान पूजन! उक्त कार्यक्रम कमलानगर के विशाल महावीर उद्धान के खुले मैदान मे आयोजित किया गया जिसमे महाराज जी की प्रेरणा से चारों दिशाओं मे 13-13 जिनालय यानि कुल 52 जिनालय की स्थापना कि गयी एवं पूज्य मुनिवर प्रणम्य सागर जी महाराज के द्वारा संस्कृत, प्राकृत एवं हिन्दी मे 5616 अर्घ सहित लिखित नन्दीश्वर महामह विधान सेंकडो जोडो द्रारा कीया गया एवं महाराजजी के श्रीमुख से स उनके अर्थ समझाये गये!

उस विधान मे मुख्य इन्द्रो के सहित चारों निकाय के देव देवीयां के पात्र बनाये गये, प्रत्येक निकाय के देवों द्रारा एक एक दिशा मे दो दिन पूजन का अवसर दीया गया, इसके बाद स्थान परिवर्तन हो जाता था, यानी पूरब वाले पश्चिम पहुंच जाते तो पश्चिम वाले उत्तर आदि आदि! उक्त विधान मे जहां समयसार की गाथाओं पर अर्घ वहीं 64 रिद्धि, भक्ताम्बर, दस लक्षण, 16 कारण भावना आदि आदि की गाथाओ को लेकर मुनी श्री ने अर्घ स्रुजित किये हैं मुनी श्री ने! याने all in one विधान है यह! पहले दिन लगभग 500 अर्घ तो दूसरे दिन लगभग 800 अर्घ कराये कराये गये, बाकी दिन भी क्रम इसी प्रकार चला, नित्य प्रात: 7 से 10 .30 तक उपरोक्त अर्घ के संग विधान सम्पन्न हो जाता था!

उसी विधान की सुन्दरता व जीवन्त नन्दीश्वर दीव्प को देख महाराज जी के मन मे विचार आया कि अगर इन 52 जिनालयो पर एक एक प्रतिमा के स्थान पर जैसी शास्त्रो मे वर्णन है वैसी प्रत्येक जिनालय मे 108 प्रतिमा युक्त जिनालय आ जायें तो इस विधान की शोभा ही कुछ होगी, बस तभी से समाज के प्रमुख लोग इस योजना पर लग गये और देश के विभिन्न मूर्तिकारो से चर्चा हुई, और तब आखिर मे जयपुर के एक प्रमुख मूर्तिकार की समझ मे कॉन्सेप्ट आया और इस प्रकार मुनी श्री की प्रेरणा से एक डिजाइन तैयार हुआ और विधान के दौरान ही घोषणा हुई और 2 मिनिट मे ही 52 जिनालय के पुन्यार्जक भी मिल गये!

बस फिर क्या था मात्र एक माह के समय मे पूज्य मुनिद्व्य प्रणम्यसागर जी व चन्द्र सागर जी महाराज की प्रेरणा से आचार्य विद्यासागर जी महाराज के आशीर्वाद से कुन्डलपुर मे उक्त चैत्यालय प्रतिष्ठित करा आगरा की कमलानगर जैन समाज के द्रारा बनवाई गयी है विश्व की पहली 108 जिनबिम्ब युक्त 52 नन्दीश्वर चल जिनालयों की स्थापना हो गयी है!*
मुनी संघ के भाव हैं कि जब भी अब कही इस प्रकार का नन्दीश्वर महामह विधान हो, तब ये चेत्यालय विधान वाले स्थान मे ले जाकर विशाल नन्दीश्वर दीव्प की रचना मे जीवन्त शोभा बडायेंगे! पूर्व मे मुनी संघ का विचार था की उक्त जिनालय कुन्डलपुर मे ही विराजित करवाये जायेंगे परन्तु बाद मे उन्होंने फिलहाल कमलानगर आगरा दिगम्बर जैन समाज को उक्त चैत्यालय संभालने की जिम्मेदारी दी है! कमलानगर आगरा समाज द्वारा इनको रखने के विषेश लकडी के सुन्दर बॉक्स भी बनवाये गये हैं, जिससे एक स्थान से दूसरे स्थान तक ये चेत्यालय सुरक्षित ले जाये जा सकेंगे!

इन नन्दीश्वर दीव्प चैत्यालय के पुन्यार्जक तो विशेष प्रसन्न हैं क्यो कि कहां एक मूर्ती के पंचकल्याणक का सौभाग्य कभी किसी को मिलता है, वहीं एसा तीव्र पुन्योदय हुआ कि एक व्यक्ति/ परिवार को 108 प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा कराने का सौभाग्य मिला है! कुन्डलपुर मे जो बार बार घोषणा हो रही थी कि लगभग 7000 से उधिक प्रतिमाओ का पंचकल्याणक हुआ है उनमे से 5616 प्रतिमायें ये नन्दीश्वर दीव्प की हैं! ये प्रतिमातये अभी श्री महावीर दिगम्बर जैन मन्दिर डी ब्लाक कमलानगर पर दर्शन के लीये उपलब्ध हैं!

*मनोज कुमार जैन बाकलीवाल, कमलानगर आगरा*

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