साधना के मार्ग में खुद रास्ता बनाते हुये आगे चलना पड़ता है’ और आराधना के मार्ग में हमें सिर्फ दूसरों का अनुकरण करना पड़ता है प्रमाणसागर महाराज
इंदौर
साधना के मार्ग में खुद रास्ता बनाते हुये आगे चलना पड़ता है’ और आराधना के मार्ग में हमें सिर्फ दूसरों का अनुकरण करना पड़ता है,साधना का मार्ग एकांकी मार्ग है जिस पर चलना हर किसी के वश में नहीं, उच्च मनोबल का धनी ही साधना के शिखर तक पहुंच सकता है,सातवीं शताब्दी में आचार्य “मानतुंगाचार्य” पर जब संकट आया और किसी बात पर नाराज होकर जब राजा ने उनको लोहे की सांकलों से बांध 48 तालों के साथ बंद कर दिया तो आचार्य मानतुंगाचार्य भगवान आदिनाथ स्वामी की भक्ती में तन्मय ऐसे डूबे कि उनके बाहर के बंधन भी टूटे और अंदर से कर्मों के बंधन भी टूट गये”
उपरोक्त उदगार भावनायोग शंकासमाधान प्रणेता मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने मोहता भवन के आचार्य विद्यासागर प्रवचन मंडप से “भक्तामर स्त्रोत” की भूमिका प्रस्तुत करते हुये व्यक्त किये*
मुनि श्री ने कहा कि जिसकी बांह में ताकत होती है वह समुद्र को तैरकर भी पार कर सकता है लेकिन जिनको तैरना नहीं आता वह ट्युव का आलम्बन लेकर पार लग सकता है भक्ती का मार्ग भव सागर से पार होंने का प्राथमिक अनुकरणीय मार्ग है,जैन परंपरा में अनेक महान महान महान आचार्य हुये है,जिन्होंने हमें पूर्ण तत्वज्ञान देते हुये आध्यात्मिकता का पाठ पढ़ाया है,वही ऐसे भी आचार्य हुये है जिन्होंने भक्ती की गंगा में अपने आपको तिरोहित करते हुये हम सभी का उद्धार किया है।मुनि श्री ने कहा कि जब हम जैन परंपरा की बात करते है,तो आध्यात्मिक संतों में आचार्य कुंदकुंद ने भक्ती की इस गंगा को प्रवाहित किया है उन्होंने कहा “भक्ती” कोई क्रिया नहीं है, “भक्ती एक साधना है” जो हमारे अंतर के उदगार से निकलती है,और हमारे कर्म काटने में सहायक सिद्ध होती है महान दार्शनिक संतों में आचार्य समन्तभद्र एवं आचार्य पूज्यपाद सहित अनेक आचार्य हुये जिन्होंने भक्तियां लिखी है,
लेकिन इन सबके मध्य आचार्य “मानतुंगाचार्य” हुये जिन्होंने “भक्तामर स्त्रोत्र” की रचना कर अलग ही छाप छोड़ी है। “णमोकार महामंत्र” के पश्चात भक्तांमर स्त्रोत ही एक मात्र ऐसा स्त्रोत है जिसकी इतनी प्रशस्ति है कि वह हमारे “जीवन का
प्राणाधार” है और सभी जैनी तो इसका आलम्वन लेते ही है,”भक्तामर स्त्रोत्र” जातिवंधन से बहूत ऊपर है,जिसने इसका स्तवन किया है उसको इसका लाभ मिला है उन्होंने कहा “भक्तामर स्त्रोत्र” पर इतनी अधिक रचनाऐं हुई है, उतनी अधिक किसी अन्य “स्त्रोत्र” की नहीं हुई इस स्त्रोत्र के प्रभाव से भारत में ही नहीं जर्मनी में भी केंसर जैसे रोग ठीक हो गये “भक्तामर की रचना में शव्द नही बीज मंत्र है” जिसका अपना विज्ञान है यह प्राणी मात्र के लिये है जो इसको ध्यायेगा उसका उद्धार हो जाऐगा। “भक्तामर एक आराधना है इससे स्वास्थ्य ठीक होता है” मुनि श्री ने कहा कि हालांकि में चमत्कार पर विश्वास नहीं करता लेकिन इसका नियमित पाठ कीजिये आपके जीवन में चमत्कार गठित होगा। भक्तामर का असली लाभ जीवन का रूपांतरण और आत्मा की अभ्युत्थान तथा चेतना की निर्मलता घटित हो जाये तो हमारे जीवन का ही कायाकल्प हो सकता है, भक्तामर स्त्रोत्र बसंत तिलिका छंद में है इसका एक एक अक्षर चमत्कारिक है।भक्तामर स्त्रोत्र संस्कृत को पढ़ना चाहिये भले ही उसके अर्थ का ज्ञान न हो लेकिन उसके शव्दों की खनक से ही आपका उद्दार हो जाऐगा आपके उच्चारण का प्रभाव तभी होता है जब आप उसका शुद्ध उच्चारण करें इसका प्रत्येक श्लोक बीज मंत्र है और इसमें अनेक शक्तियाँ है। यदि आप संस्कृत नही जानते है तो कोई बात नहीं आप भावनात्मक रुप से इसका लाभ उठाइये एवं साथ में कापी पेन एवं किताब को सामने रखिये और भक्तामर की इस कक्षा में शव्दार्थ ही नहीं वल्कि इसके गूढार्थ को भी आपके सामने रखेंगे।ओन लाईन पर भी सभी अपनी तैयारी के साथ पूरा मनोभाव बनायें। उ
उपरोक्त जानकारी देते हुये प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया प्रतिदिन प्रातः8:30 बजे से 9:20 तक भक्तामर की कक्षा का स्वाध्याय मुनि श्री के मुखारविंद से होगा सभी इसका लाभ उठायें तथा आगामी 29 सितंवर रविवार को मुनिसंघ का प्रवास दि.जैन मंदिर नसिया में होगा मुनि श्री संघ सहित प्रातःकाल की बेला में6:30 बजे मोहताभवन से जाएंगे एवं अभिषेक शांतीधारा के उपरांत8:30 बजे से प्रवचन एवं10 बजे से आहार चर्या संपन्न होगी। सभी से निवेदन है कि समय पर पहुंचकर धर्म लाभ उठाए।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
