स्वयं को समझना ही उत्तम आकिंचन धर्म है।अन्तर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज

धर्म

स्वयं को समझना ही उत्तम आकिंचन धर्म है।अन्तर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज

कुलचाराम हैदराबाद
अंतरमना आचार्य श्री 108 प्रसंग सागर महाराज नेउत्तम आकिंचन धर्म बोलते हुए इसका अर्थ समझाया और कहा कि- जो दिख रहा है वह सब छूटने वाला है। राजा हो या रंक, सन्त हो या फकीर, सबको मौत आयेगी। खाली हाथ आया है और खाली हाथ जायेगा।जो हमने जोड़ा है, वो सब यहीं छूट जायेगा।जिसने कहा मेरा – वो मरा ।जिसने कहा तेरा – वो तरा ।।

 

महाराज श्री ने समझाया कि किसी के पास कमी कुछ भी नहीं और कड़वा सच यही है कि पूरा कुछ भी नहीं है। सुख – प्राप्त का नहीं, जितना दुःख – अप्राप्त का है। अप्राप्त के लिये ही हम अपना सारा जीवन दांव पर लगा देते हैं। ब्रह्माण्ड में जो सुख स्वयं को समझने का है वो सुख दूसरों को समझाने में नहीं है। दूसरों को समझाना सरल है परन्तु स्वयं को समझना और जानना सबसे कठिन काम है। स्वयं को समझना ही उत्तम आकिंचन धर्म है।

 

 

 

अभी हम दूसरों को समझाने में जितने माहिर है, शायद स्वयं को समझने में उतने माहिर नहीं हो पा रहे, यही दु:ख है इस जीवन का। स्वयं को समझने की दिशा ही उत्तम आकिंचन की दिशा है। हर व्यक्ति अपने भीतर के ब्रह्माण्ड से अनभिज्ञ है, अनजान और अपरिचित है। भीतर के ब्रह्माण्ड का एक अपना सौन्दर्य है। यदि एक बार उस ब्रह्माण्ड के सौन्दर्य से परिचित हो गये तो बाहर के सभी आकर्षण फीके और नीरस लगेंगे। क्योंकि कहीं हरियाली है, तो कहीं उबड़ खाबड़, तो कहीं इच्छाओं के पहाड़ खड़े हैं।

 

 

 

सबके भीतर के सौन्दर्य का विस्तार अलग अलग है। जो स्वयं को जानने और समझने के लिये जितना समय देता है, या नहीं देता, या कम समय देता है,, यह उस पर निर्भर करता है। हम स्वयं को कितना समय देते हैं और स्वयं से कितने परिचित हैं, यह स्वयं पर निर्भर करता है। क्योंकि आने वाले समय में, कोई व्यक्ति कितना भी महत्वपूर्ण क्यों ना हो लेकिन हमारे अन्दर उस ब्रह्माण्ड के प्रति देखने, जानने और समझने का वक्त नहीं है,, तो हम भीतर के ब्रह्माण्ड के सौन्दर्य से अपरिचित ही रह पायेंगे।

 

इसलिए जीवन के असली मर्म को जानने और समझने के लिये हर स्थिति में निज की चेतना का ध्यान रखना चाहिए।*एकान्त विचारों से मौन, इच्छाओं को शान्त, मन की निर्लोभिता और शीशू सी निश्छलता ही उत्तम आकिंचन का सही मार्ग है।

 

उत्तम आकिंचन धर्म का मतलब है – कुछ भी जोड़ लो, साथ कुछ भी नहीं जायेगा, सिर्फ साथ जायेगा – धर्म, सत्संग, पुण्य, सेवा सत्कार और परोपकार…!!!

। नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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