जो तुम्हारा था नहीं, है नहीं, भविष्य में होगा नहीं, बस आज उसका त्याग कर दो : निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज
🗓️ 15 सितम्बर 2024, रविवार• भाग्योदय तीर्थक्षेत्र, सागर
धर्म समझाया नहीं जाता, समझा जाता है लेकर संसार में व्यक्ति समझना नहीं चाहता, समझने की चेष्टा भी नहीं करना चाहता और समझाए कोई तो मानना नही चाहता। परिणाम स्वरूप समझाने वालों को पैदा करना पड़ता है और समझाने के अनेक तरीके अपनाना पड़ता है। जो समझने का एक इच्छुक है उसे किसी की भी जरूरत नहीं, समझने के लिए- ‘मुझे कुछ मत समझाओं, मुझे तो आदेश दो, करना क्या है? जो समझने की अपेक्षा करने पर विश्वास करता है उससे बड़ा समझदार दुनिया में कोई हो ही नहीं सकता। धर्म इतना सा ही है-आज्ञा, मुझे आज्ञा मनाना है। यह दशा जब जाग जाती है तब उसे धर्म की सिद्धि हो जाती है।
णमोकार मंत्र इसलिए महामंत्र है क्योंकि इसमें भगवान पहले नहीं आया है, इसमे नमस्कार पहले आया है। आज तक दुनिया का कोई मंत्र नहीं बना जिसमें नम: शब्द पहले आया हो। नमस्कार पहले आना ही इसकी सबसे बड़ी महानता है, सारे मंत्र इसमे समा गए है। मुझे जहाँ भगवान है वहाँ नमस्कार नहीं करना, जहाँ नमस्कार होगा, वहाँ मेरे भगवान होंगे। भगवान पर भरोसा करने की अपेक्षा अपने नमोस्तु पर विश्वास करो, हमें गुरु खोजने की जरूरत नहीं है, अपने शिष्यत्व पर विश्वास करो।
जो तुम्हारा था नहीं, जो तुम्हारा है नहीं, जो तुम्हारा होगा नहीं आज उसका त्याग कर दो। 90% लोग जितने कर्म बंध करते हैं उन वस्तु से करते है- जो न तुम्हारी थी, न है और न रहेगी। आप स्वयं देखना 24 घंटे में आपका परिणाम किन-किन चीजों पर बिगड़ा है? जिसको मार नहीं पाए, मार नहीं पाओगे, मार नहीं रहे हो, कम से कम ऐसी हिंसा का त्याग कर दो, निष्प्रयोजन हिंसा है यह, लेना एक न देना दो। तुम पड़ोसी की हवेली देखकर कषाय कर रहे हो, तुम्हारी थी नहीं, है नहीं, होगी भी नहीं।
मैं वह कल्पना की उड़ाने नहीं भरूँगा, जो जिंदगी में होना ही नहीं है, जो जिंदगी में मिलना ही नहीं है, जो मेरी थी नहीं, है नहीं,
रहेगी नहीं। 75% पाप से बच जाओगे बस ऐसे विचारों का त्याग कर दो जो न तुम्हारे थे, न है और न रहेंगे। जब भी तुम्हारे मन में विकल्प आवे तुरंत सोचना- क्या यह मेरी वस्तु है, क्या यह मेरी थी, क्या कल मेरी होगी, यदि तीनों के जबाब न में आये तो आज उत्तम त्याग के दिन नियम ले लो हम ऐसी वस्तुओं के प्रति
सम्पूर्ण त्याग करते है, ऐसी वस्तु को कभी ग्रहण करने का भाव नहीं करेंगे।





दूसरे नम्बर का वह त्याग करना जो तुम्हारी दृष्टि में अहितकारी हो। तीसरे नम्बर पर जो तुम्हारे अपने हो, जिनको तुम सगा मानते हो, तुम्हारे हितैषी है, वो जिस चीज की मना करे, उसका त्याग कर देना। चौथे नम्बर पर यदि तुम धर्मात्मा हो तो जिनेद्रदेव, गुरु, जिनवाणी जिस चीज की मना करे उसका त्याग कर देना क्योंकि मैं जिनेंद्र भक्त हूँ। भक्ति का अर्थ है जो मेरे भगवान, गुरु और जिनवाणी को पसंद नहीं, वह मुझे पसंद नहीं।
विचार से भिन्न व्यक्ति से कभी सम्बंध मत जोड़ना इसलिए कुंडली मिलाई जाती थी कि अनजाने दो व्यक्ति हैं, पता नहीं कैसा मिल जाए तो कुंडली के माध्यम से कहते हैं दोनों का विचार एक रहेगा क्या? तो सही व्यक्ति वही है जो मेरे गुरु को पसंद नहीं, वह मैं मुझे पसंद नहीं। बस अपने भगवान की नपसन्द चीजों को छोड़ देने का नाम ही जिनेंद्र भक्त का त्याग धर्म है। जिसको पुनः ग्रहण न करना पड़े उसका नाम त्याग है। त्याग का गृहस्थों की अपेक्षा दूसरा नाम दान है
अजय जैन लांबरदार से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
