भोग में लाई गई वस्तु को छोड़ देना भी त्याग धर्म है। प्रज्ञा सागर महाराज
झालरापाटन।
तपोभूमि प्रणेता एवं पर्यावरण संरक्षक आचार्य प्रज्ञा सागर महाराज ने कहा कि आत्म शुद्धि के उद्देश्य से विकार भाव छोड़ना तथा स्व पर उपकार की दृष्टि से धन आदि का दान करना त्याग धर्म है। दिगंबर जैन समाज के तत्वाधान में 10 लक्षण पर्व के तहत शांतिनाथ बाड़ा मे आयोजित धर्म सभा में आचार्य ने कहा कि भोग में लाई गई वस्तु को छोड़ देना भी त्याग धर्म है। आध्यात्मिक दृष्टि से राग द्वेष क्रोध मान आदि विकार भावों का आत्मा से छूट जाना ही त्याग है। उससे नीची श्रेणी का त्याग धन आदि से ममत्व छोड़कर अन्य जीवों की सहायता के लिए दान करना है।
आचार्य श्री ने बताया कि जिनेंद्र भगवान ने कहा है कि जो जीव सारे पर द्रव्यों के मोह को छोड़कर संसार, देह और भोगों से
उदासीन परिणाम रखता है, उसके त्याग धर्म होता है। दान और त्याग दोनों में थोड़ा अंतर है। राग द्वेष से अपने को छुड़ाने का नाम त्याग है। वस्तुओं के प्रति राग द्वेष के अभाव को त्याग कहा गया है। दान में भी राग भाव हटाया जाता है। किंतु जिस वस्तु का दान किया जाता है उसके साथ किसी दूसरे के लिए देने का भाव भी रहता है। दान निमित्त को लेकर किया जाता है किंतु त्याग में पर की कोई अपेक्षा नहीं रहती किसी को देना नहीं है। मात्र छोड़ देना है। त्याग स्व को निमित्त बनाकर किया जाता है। आचार्य ने






कहा कि त्याग दो रूप में होते हैं। एक सर्वस्व और दूसरा अंश। जो सर्वस्व को त्यागता है वह साधु होता है। सर्वस्व में धन संपत्ति, घर परिवार तो है ही, शरीर का मोह भी छूटता है। सब त्यागने के बाद हम अपने आप से अपना संबंध जोड़ पाते हैं वह सर्वस्व त्याग कहलाता है। गृहस्थ सर्वस्व नहीं त्याग सकता क्योंकि उसके लिए उसकी गृहस्थी है। उसके ऊपर उसके स्वयं का, परिवार का, कुटुंब का, समाज का और देश का बहुत बड़ा दायित्व है, जिम्मेदारी है, कर्तव्य है जिसका उसे अनुपालन करना है। अंश का त्याग करो, सर्वस्व को त्यागने का नाम त्याग है और अंश को छोड़ने का नाम दान है। दान भी त्याग है इसलिए हमें समय-समय पर अपने जीवन में कुछ न कुछ दान करते रहना चाहिए।
नलीन जैन लुहाड़िया से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747311
